सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOC) को एक महिला उम्मीदवार को केवल उसके लिंग के आधार पर LPG बॉटलिंग प्लांट में नौकरी से वंचित करने के मामले में ₹12 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने इस मामले में लैंगिक भेदभाव पर कड़ी टिप्पणी की और कहा कि किसी महिला को सिर्फ इसलिए नौकरी से दूर करना कि वह LPG सिलेंडर नहीं उठा सकती, उसके सम्मान और समान अवसर के अधिकार के खिलाफ है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला हरियाणा के गुड़्हा गांव की रहने वाली सुमित्रा से जुड़ा है। सुमित्रा उन 49 उम्मीदवारों में शामिल थीं, जिनकी सिफारिश डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली स्थानीय समिति ने IOC के LPG बॉटलिंग प्लांट में रोजगार के लिए की थी।
उन्होंने कैजुअल खलासी/प्यून/रिफिलिंग हेल्पर के पद के लिए इंटरव्यू दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक, अन्य उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र दिए गए, लेकिन सुमित्रा को नियुक्त नहीं किया गया। मामले में सामने आया कि उनके महिला होने को नियुक्ति से इनकार का आधार बनाया गया था।
‘क्या महिलाएं LPG सिलेंडर नहीं उठा सकतीं?’
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने IOC की दलीलों पर सवाल उठाते हुए महिला को केवल लिंग के आधार पर अनुपयुक्त मानने की सोच की आलोचना की। अदालत ने इसे महिला के सम्मान और गरिमा के लिए अपमानजनक बताया।
IOC की ओर से काम में भारी LPG सिलेंडर उठाने और रात की शिफ्ट जैसी परिस्थितियों का हवाला दिया गया था। हालांकि, अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या केवल महिला होने के आधार पर किसी उम्मीदवार को काम के लिए अयोग्य माना जा सकता है।
नौकरी की जगह क्यों मिला ₹12 लाख मुआवजा?
सुमित्रा ने लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ी। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2025 में नियुक्ति के दावे को स्वीकार नहीं किया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अब सुमित्रा सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुकी हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इस स्तर पर नौकरी देने के बजाय ₹12 लाख का एकमुश्त मुआवजा देना उचित माना।
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