हेमंत शर्मा, इंदौर। शहर के जोन-3 के एक थाने को लेकर पुलिस महकमे में कथित वसूली और सेटलमेंट का ऐसा मामला सामने आने की चर्चा है, जिसकी कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगती। आरोप है कि थाने में पदस्थ एक सिपाही, जो पहले क्राइम ब्रांच में रह चुका है, नए टीआई के आने के बाद उनके साथ ही थाने में आया और अब टीआई के केबिन के आसपास ही उसका अधिकांश समय गुजरता है।
टीआई का केबिन या सिपाही का ‘कंट्रोल रूम’?
आरोप लगाने वालों के मुताबिक, सिपाही खुद को इतना प्रभावशाली मानता है कि थाने के कई मामलों में उसकी दखल रहती है। दावा है कि थाने में आने वाले कुछ मामलों में वह सीधे सक्रिय हो जाता है और संबंधित लोगों को थाने बुलाकर पूछताछ के नाम पर दबाव बनाया जाता है।सबसे गंभीर आरोप उन मामलों को लेकर हैं, जिनमें किसी व्यक्ति के नाम पर सिम नहीं होने या किसी दूसरे व्यक्ति के नाम से सिम इस्तेमाल किए जाने को आधार बनाकर कार्रवाई की जाती है।
पहले लाखों की डिमांड, फिर ‘सेटलमेंट’ का आरोप
आरोप है कि ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति को थाने लाकर गंभीर धाराओं में फंसाने का डर दिखाया जाता है। कथित तौर पर शुरुआत में 15 से 20 लाख रुपये तक की रकम की मांग की जाती है।इसके बाद बातचीत और कथित मोलभाव का दौर चलता है और आरोपों के मुताबिक रकम घटकर एक से दो लाख रुपये तक पहुंच जाती है। दावा यह भी है कि कथित रकम के बाद संबंधित व्यक्ति को थाने से जाने दिया जाता है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ वास्तव में गंभीर अपराध है, तो उसकी कार्रवाई कानून के मुताबिक होनी चाहिए या फिर किसी कथित ‘सेटलमेंट’ के बाद मामला खत्म हो जाना चाहिए?
CCTV से दूर कथित ‘ब्लैकआउट जोन’
पूरे मामले में सबसे गंभीर आरोप CCTV को लेकर हैं। दावा है कि थाने में कथित लेन-देन या बातचीत के लिए ऐसी जगहों का इस्तेमाल किया जाता है, जहां CCTV कैमरों की निगरानी नहीं होती। अगर यह आरोप सही हैं, तो किसी भी शिकायत या जांच की स्थिति में घटनाक्रम का इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सामने आना मुश्किल हो सकता है।इसी तरह एक नाबालिग को कथित तौर पर CCTV की नजर से दूर बैठाकर रखने का भी आरोप है। दावा है कि बाद में कथित रूप से रकम लेकर उसे बिना औपचारिक कार्रवाई के छोड़ दिया गया।नाबालिग से जुड़े इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि भी आवश्यक है और यदि ऐसा हुआ है तो यह गंभीर जांच का विषय बनता है।
मुख्य आरोपी से ज्यादा उसकी ‘चेन’ पर नजर?
आरोपों के मुताबिक, कथित तौर पर कार्रवाई का पैटर्न सिर्फ मुख्य आरोपी तक सीमित नहीं रहता। उससे जुड़े दूसरे लोगों को भी पूछताछ के नाम पर थाने बुलाया जाता है और फिर कथित तौर पर अलग-अलग स्तर पर ‘सेटलमेंट’ की कोशिश होती है।यानी सवाल सिर्फ एक व्यक्ति पर कार्रवाई का नहीं, बल्कि उस कथित नेटवर्क का है जिसके जरिए कई लोगों को कार्रवाई के डर के दायरे में लाने का आरोप लगाया जा रहा है।
अब सवाल पुलिस के आला अधिकारियों से
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर थाने के भीतर इस तरह की गतिविधियां चलने के आरोप हैं, तो इसकी जानकारी थाना प्रभारी और वरिष्ठ अधिकारियों तक कैसे नहीं पहुंची? और अगर शिकायतें या इनपुट पहले से मौजूद हैं, तो उनकी जांच क्यों नहीं हुई? इन आरोपों की सच्चाई सामने लाने के लिए CCTV फुटेज, थाने की GD/रोजनामचा एंट्री, संबंधित मामलों की केस डायरी, मोबाइल लोकेशन और कथित रूप से थाने लाए गए लोगों के बयान अहम साबित हो सकते हैं। फिलहाल इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में पुलिस विभाग की जांच के बाद ही यह साफ हो सकेगा कि जो दावे सामने आ रहे हैं, उनमें कितनी सच्चाई है और क्या वास्तव में थाने के भीतर किसी तरह का अवैध ‘सेटलमेंट’ चल रहा था।

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