गुलशन कुमार, नारनौल। नांगल चौधरी क्षेत्र के गांव बसीरपुर और घाटासेर में प्रस्तावित मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक हब परियोजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट से मिली बड़ी राहत के बाद प्रभावित किसानों में खुशी की लहर दौड़ गई है। अदालत के इस आदेश के बाद आज खातौली अहीर और खातौली जाट के ग्रामीण और किसान इकट्ठा हुए। उन्होंने एक-दूसरे को लड्डू खिलाकर अपनी इस बड़ी कामयाबी का जश्न मनाया और देश की न्यायपालिका के प्रति अपना आभार जताया।
सरकार और एचएसआईआईडीसी की मनमानी पर लगी रोक
किसानों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में बिल्कुल साफ कर दिया है कि अगली सुनवाई तक हरियाणा सरकार और एचएसआईआईडीसी किसानों की इस जमीन पर किसी भी तरह की कोई जबरन कार्रवाई नहीं कर सकते। इस फैसले को आंदोलनकारी किसान अपनी लंबी कानूनी लड़ाई में एक बहुत बड़ी जीत मान रहे हैं। किसानों ने भावुक होते हुए कहा कि देश का किसान अपनी जमीन को अपनी मां के समान पूजता है, लेकिन देश और राज्य के विकास कार्यों के लिए वह अपनी जमीन देने से कभी पीछे नहीं हटता। बस हमारी मांग इतनी है कि अगर सरकार विकास के नाम पर जमीन का अधिग्रहण करती है, तो किसानों को देश के कानून के मुताबिक उचित और सही मुआवजा मिलना चाहिए।

पूर्व मंत्री और तत्कालीन विधायक पर लगाया बड़ा आरोप
इस खुशी के मौके पर किसानों ने पूर्व विधायक और तत्कालीन भाजपा सरकार के मंत्री पर भी तीखा निशाना साधा। किसानों का आरोप है कि लॉजिस्टिक हब प्रोजेक्ट की शुरुआत के दौरान तत्कालीन विधायक ने इलाके के भोले-भाले किसानों के साथ बड़ा अन्याय किया। उन्होंने राजनीतिक दबाव बनाकर किसानों की कीमती जमीनें बहुत ही कम दामों पर बिकवा दीं। ग्रामीणों ने कहा कि अगर किसानों को उनकी जमीन का सही और जायज मुआवजा समय पर मिल गया होता, तो अब तक इस लॉजिस्टिक हब का काम पूरा हो चुका होता। हब के निर्माण में हो रही इस देरी के असली जिम्मेदार पूर्व मंत्री ही हैं, जिन्होंने किसानों के साथ धोखा किया।
2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत मुआवजे की मांग
ग्रामीणों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने किसानों की भावनाओं और उनके कानूनी अधिकारों को बखूबी समझा है। अदालत के रुख से साफ है कि अगर सरकार इस मेगा प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाना चाहती है, तो उसे साल 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के नियमों और प्रावधानों का पालन करना होगा। सरकार को हर हाल में किसानों को नया और उचित मुआवजा देना ही पड़ेगा। किसानों ने रोष जताते हुए कहा कि नेताओं ने अपने निजी स्वार्थ में किसानों के हितों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया, जिसकी वजह से मजबूर होकर उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
91 किसानों ने खटखटाया था अदालत का दरवाजा
आपको बता दें कि लॉजिस्टिक हब के लिए कम रेट पर अधिग्रहित की जा रही जमीन के विरोध में इलाके के 91 किसानों ने एकजुट होकर अदालत में याचिका दायर की थी। अब देश की सबसे बड़ी अदालत से अंतरिम राहत मिलने के बाद प्रभावित परिवारों की उम्मीदें अगली सुनवाई पर टिकी हैं। किसानों को पूरा भरोसा है कि सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद अब उन्हें अपनी मातृभूमि का सही दाम और पूरा न्याय जरूर मिलेगा।

