अजय सैनी, भिवानी. देशभर के लाखों शिक्षकों के सेवा-अधिकारों और भविष्य पर मंडराते संकट को देखते हुए अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ हरियाणा की जिला भिवानी इकाई ने केंद्र सरकार के समक्ष अपनी आवाज बुलंद की है। संगठन के पदाधिकारियों ने भिवानी उपायुक्त के माध्यम से प्रधानमंत्री और केंद्रीय शिक्षा मंत्री को मांगपत्र सौंपकर 23 अगस्त 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा की अनिवार्यता से स्थायी रूप से मुक्त रखने की मांग की है।

इससे पूर्व अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ हरियाणा के पदाधिकारियों ने स्थाानीय हुडा पार्क में बैठक आयोजित हुई। इस दौरान प्रांत संयोजक शमशेर कौशिक, जिला अध्यक्ष विनोद कौशिक, जिला मंत्री विजय पाल, जिला उपाध्यक्ष संदीप कौशिक भी मौजूद रहे।

इस मौके पर प्रांत संयोजक शमशेर कौशिक व जिला अध्यक्ष विनोद कौशिक ने बताया कि महासंघ द्वारा भेजे गए पत्र के अनुसार राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा 23 अगस्त 2010 को टीईटी को लेकर अधिसूचना जारी की गई थी। हाल ही में 29 मई को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज करते हुए पुराने फैसले को यथावत रखने का निर्णय सुनाया गया है। इस न्यायिक निर्णय के बाद वर्ष 2010 से पहले नियुक्त हुए शिक्षकों के मन में अपने रोजगार, वरिष्ठता और सेवा-अधिकारों को लेकर गहरा डर, पीड़ा और असुरक्षा की भावना पैदा हो गई है।


शिक्षकों का पक्ष रखते हुए प्रांत संयोजक शमशेर कौशिक व जिला अध्यक्ष विनोद कौशिक ने कहा कि कानून और न्याय का यह स्थापित सिद्धांत है कि कोई भी नियम या अधिसूचना अपने लागू होने की तिथि से प्रभावी होती है, न कि उसके पहले से। उन्होंने कहा कि 23 अगस्त 2010 से पूर्व विभिन्न राज्यों में लाखों शिक्षकों की नियुक्तियां उस समय लागू नियमों, योग्यताओं और चयन प्रक्रियाओं के तहत पूरी तरह वैध रूप से की गई थीं। इन शिक्षकों ने पिछले कई दशकों से राष्ट्र निर्माण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सामाजिक चेतना में अपना अमूल्य योगदान दिया है। ऐसे में बाद में तय किए गए पात्रता मानदंडों को पूर्व-नियुक्त शिक्षकों पर लागू करना प्राकृतिक न्याय, समानता और विधिक निश्चितता के सिद्धांतों के खिलाफ है।


उन्होंने कहा कि जहां एक ओर न्यायपालिका कानून की व्याख्या करती है, वहीं जनहित में आवश्यक नीतिगत और विधायी समाधान निकालने का सर्वोच्च अधिकार संसद और केंद्र सरकार के पास सुरक्षित है। इसलिए संगठन ने केंद्र सरकार से इस गंभीर विषय पर तुरंत हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है। उन्होंने मांग की कि 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त सभी शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता से पूरी तरह और स्थायी रूप से मुक्त किया जाए।

ऐसे अनुभवी शिक्षकों की सेवा, वरिष्ठता, पदोन्नति और अन्य सभी सेवा-लाभों को पूर्ण कानूनी संरक्षण दिया जाए। यदि आवश्यक हो तो संसद में उपयुक्त विधायी संशोधन अथवा विशेष प्रावधान लाकर इस प्रभावित शिक्षक वर्ग को स्थायी राहत पहुंचाई जाए। केंद्र सरकार सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे, ताकि शिक्षकों के बीच व्याप्त असमंजस और असुरक्षा की स्थिति का तत्काल निवारण हो सके।