शब्बीर अहमद, भोपाल। मध्य प्रदेश शासन के वित्त विभाग ने राज्य के वित्तीय प्रबंधन को लेकर एक बड़ा और सख्त कदम उठाया है। सरकार ने विभिन्न सरकारी उपक्रमों, निगमों और मंडलों द्वारा लिए गए करीब 46 हजार करोड़ रुपये के ‘ऑफ-बजट’ (Off-Budget) कर्ज और उसके ब्याज भुगतान का पूरा हिसाब तलब किया है। इस संबंध में वित्त विभाग ने सभी संबंधित विभागों को पत्र जारी कर विस्तृत ब्योरा मांगा है।
किन विभागों और उपक्रमों पर है नजर?
इस उच्च स्तरीय समीक्षा के दायरे में मुख्य रूप से वे सरकारी उपक्रम और निगम आते हैं, जिन्होंने बाजार से या वित्तीय संस्थाओं से सरकार की गारंटी पर कर्ज ले रखा है। बिजली कंपनियां और सड़क विकास निगम: ऊर्जा क्षेत्र और बुनियादी ढांचे से जुड़े उपक्रमों के वित्तीय लेन-देन की गहराई से समीक्षा की जा रही है।
प्रमुख वित्तीय आंकड़े और प्रस्ताव
नाबार्ड (NABARD) से लगभग 4,600 करोड़ और एशियाई विकास बैंक (ADB) से करीब 1,450 करोड़ रुपये के कर्ज का जिक्र सामने आया है। ऊर्जा क्षेत्र: ऊर्जा सेक्टर में 2,630 करोड़ रुपये के अल्पकालीन (Short-term) कर्ज का प्रस्ताव शामिल है। इसके अलावा सोलर सेल संयंत्र के लिए 1,134 करोड़ और ‘कृषक मित्र सूर्य योजना’ के लिए 343 करोड़ रुपये के प्रावधानों की समीक्षा की जा रही है। वित्त विभाग ने संबंधित विभागों से विशेष तौर पर जुलाई से सितंबर तिमाही तक किए गए ब्याज भुगतान और सरकार की ओर से दी गई वित्तीय सहायता (Financial Assistance) की पूरी जानकारी मांगी है।
कैग की चिंता और खजाने पर संभावित बोझ
भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) द्वारा ऑफ-बजट कर्जों को लेकर पहले ही चिंता जताई जा चुकी है। इस प्रकार के कर्ज सीधे तौर पर बजट के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) में स्पष्ट रूप से नहीं दिखते हैं, लेकिन यदि संबंधित सरकारी उपक्रम या निगम समय पर अपने कर्ज और ब्याज चुकाने में नाकाम रहते हैं, तो अंततः इसका वित्तीय बोझ सीधे राज्य के खजाने पर पड़ता है। इसी संभावित जोखिम को भांपते हुए वित्त विभाग ने समय रहते स्थिति की समीक्षा और नियंत्रण की कवायद शुरू कर दी है।
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