सतीश सिंह, लखनऊ. समाजवादी पार्टी के विधानमंडल दल के मुख्य सचेतक पद से कमाल अख्तर के इस्तीफे ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के दो दिवसीय लखनऊ दौरे के बीच यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब राजनीतिक गलियारों में सपा के कुछ सांसदों के भाजपा के संपर्क में होने की अटकलें लगाई जा रही हैं. हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सियासी चर्चाओं ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है. ऐसे में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने दोहरी चुनौती खड़ी दिखाई दे रही है. एक तरफ लोकसभा में अपने सांसदों को एकजुट बनाए रखने की जिम्मेदारी है तो दूसरी ओर 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों को भी गति देनी है.
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मुरादाबाद की राजनीति और अंदरूनी खींचतान
मुरादाबाद मंडल में कमाल अख्तर और सांसद रुचि वीरा के बीच लंबे समय से मतभेद की चर्चाएं रही हैं. बताया जाता है कि अखिलेश यादव ने दोनों नेताओं को लखनऊ बुलाकर स्थिति संभालने की कोशिश की थी, लेकिन मतभेद पूरी तरह खत्म नहीं हो सके. रुचि वीरा को आजम खां खेमे के करीब माना जाता है. आजम खां पार्टी के कद्दावर चेहरा माने जाते हैं, खासकर उस समय जब यूपी में वोटर लिस्ट के हालिया सत्यापन में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी हुई हो. वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने एसटी हसन का टिकट काटकर उन पर भरोसा जताया था. सपा ने उस चुनाव में 37 सीटें जीतकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई थी.
2027 की चुनौती और पीडीए की रणनीति
लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद अब समाजवादी पार्टी की नजर 2027 के विधानसभा चुनाव पर है. पार्टी पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को और मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है. ऐसे में किसी भी तरह की टूट या असंतोष का संदेश संगठन के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है. फरवरी 2024 के राज्यसभा चुनाव में हुई क्रॉस वोटिंग का अनुभव भी पार्टी नेतृत्व के सामने है. उस समय कई विधायकों ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया था, जिसके बाद सपा ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था. बाद में इनमें से कुछ नेताओं को भाजपा संगठन और सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी मिलीं.
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भाजपा की रणनीति पर भी नजर
लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 के गिरने के बाद बंगाल चुनावों ने भारतीय जनता पार्टी को संजीवनी दी है. भाजपा की कोशिश है कि उसके आने वाले सभी विधेयक आसानी से पास हो जाएं, क्योंकि संविधान संशोधन के लिए लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. उस दौरान बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े थे, वहीं इसके विरोध में 230 वोट पड़े. इस बिल को पास कराने के लिए कम से कम 352 वोटों की जरूरत थी. वर्तमान में एनडीए के पास 318 सांसद हैं, जिनमें भाजपा के 246 सांसद हैं.
भाजपा को जगी उम्मीद
बंगाल में टीएमसी के 20 सांसदों व शिवसेना यूबीटी के 6 सांसदों के टूटने के बाद भाजपा की उम्मीद लगातार बनी हुई है. राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा अपने संगठनात्मक विस्तार और राजनीतिक मजबूती को लगातार आगे बढ़ाने में जुटी है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केंद्र सरकार भविष्य के महत्वपूर्ण विधेयकों को लेकर भी व्यापक समर्थन सुनिश्चित करना चाहती है. ऐसे में विपक्षी दलों के भीतर होने वाले किसी भी बदलाव पर भाजपा की नजर स्वाभाविक मानी जा रही है. हालांकि, सपा के सांसदों को लेकर चल रही चर्चाओं को अखिलेश यादव अफवाह करार दे चुके हैं. न ही भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने आया है.
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सब कुछ सामान्य या संगठनात्मक चुनौतियां बढ़ी
कमाल अख्तर के इस्तीफे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या समाजवादी पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य है या फिर 2027 की लड़ाई से पहले संगठनात्मक चुनौतियां बढ़ रही हैं. हालांकि यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि यदि ऐसा नहीं रहता तो माफिया अतीक अहमद के मारे जाने के बाद चायल सीट से विधायक पूजा पाल द्वारा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगस्त 2025 में विधानसभा में तारीफ किए जाने पर पार्टी उन्हें बाहर का रास्ता नहीं दिखाती. पूजा पाल वर्तमान में भाजपा की नई कार्यकारिणी में प्रदेश उपाध्यक्ष हैं.
सपा की प्रतिबद्धता सत्ता रही
इस मसले पर भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव का कहना है कि राजनीतिक वातायन में बहुत सारी बाते चलती है. सपा के सांसदों के टूट का मामला सपा का अंदरूनी विषय है, लेकिन अगर ऐसी बाते आई भी तो उसके पीछे जरूर कोई बात रही होंगी. सपा की प्रतिबद्धता केवल सत्ता रही है. समाजवाद के दर्शन से उन्हें कोई मतलब नहीं. जहां तक कमाल अख्तर के इस्तीफे का प्रश्न है तो यह सपा का मामला है.

