DHARM DESK :- प्राचीन कथाओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष के दिनों में पूर्वज सूक्ष्म रूप में धरती पर आते हैं। अपने वंशजों द्वारा दिए गए तर्पण तथा भोजन को स्वीकार करते हैं।शास्त्रों में ऐसा विधान है कि पितृपक्ष के दौरान बनाए गए सात्विक भोजन का पहला अंश मनुष्य खुद ग्रहण न करके कुछ विशेष जीवों के लिए निकालता है। इनमें गाय, कुत्ता और कौआ मुख्य रूप से शामिल रहते हैं।इन जीवों को भोजन कराने का क्या महत्व है।

गौमाता

शास्त्रों में वर्णित है कि पितृ पक्ष में भोजन का पहला हिस्सा गाय के लिए निकाला जाता है। सनातन धर्म में गाय को बहुत पूजनीय माना गया है और मान्यता है कि गाय के अंदर देवी-देवताओं का वास होता है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आत्मा को मृत्यु के बाद वैतरणी नदी पार करनी होती है और गौ सेवा या गाय को भोजन कराने से यह राह आसान हो जाती है। जब पितृ पक्ष के समय गाय को ग्रास रोटी व भोजन दिया जाता है।तो इससे न केवल देवी-देवता प्रसन्न होते हैं।बल्कि पूर्वजों की आत्मा को भी परम तृप्ति और शांति मिलती है।

    श्वान

    कुत्ता भगवान यमराज का पशु माना जाता है। श्राद्ध के भोजन का एक भाग कुत्ते को खिलाने से यमराज खुश होते हैं और मनुष्य को अकाल भय से मुक्ति मिलती है। कुत्ते के लिए निकाले गए इस विशेष भाग को धार्मिक शब्दावली में ‘कुकुर बलि’ भी कहा जाता है।

    काक

    पितृ पक्ष में कौए का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कौए को पितरों का रूप या संदेशवाहक माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि कौए द्वारा ग्रहण किया गया भोजन सीधे पितृ देवों तक पहुचता है। कौए को भोजन देने से पितर संतुष्ट होकर अपने परिजनों को सुख, समृद्धि और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।