बॉम्बे हाईकोर्ट ( Bombay High Court ) ने नाबालिग से रेप के मामले में तल्ख टिप्पणी की है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को एक पिता के इस दावे को बेहद मनगढ़ंत बताया कि उसकी नाबालिग बेटी ने उस पर बलात्कार का आरोप केवल गुस्से में आकर लगाया था। जस्टिस मनीष पिताले और जस्टिस श्रीराम शिरसात की बेंच ने व्यक्ति की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी अपील खारिज कर दी। व्यक्ति ने अपनी याचिका में तर्क दिया कि उसकी बेटी ने उसे इसलिए फंसाया क्योंकि उसने उसे पढ़ाई बीच में ही छोड़ने के लिए मजबूर किया था। जिसे उसने माता-पिता की ओर से उठाए गए अनुशासनात्मक कदम के रूप में पेश किया। इससे उसकी बेटी के मन में नाराजगी पैदा हुई।
बॉम्बे हाईकोर्ट सोमवार को एक पिता के इस दावे को बेहद मनगढ़ंत बताया कि उसकी नाबालिग बेटी ने उस पर बलात्कार का आरोप केवल गुस्से में आकर लगाया था। हाईकोर्ट ने व्यक्ति की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी अपील खारिज कर दी।
व्यक्ति ने अपनी याचिका में तर्क दिया कि उसकी बेटी ने उसे इसलिए फंसाया क्योंकि उसने उसे पढ़ाई बीच में ही छोड़ने के लिए मजबूर किया था। जिसे उसने माता-पिता की ओर से उठाए गए अनुशासनात्मक कदम के रूप में पेश किया। इससे उसकी बेटी के मन में नाराजगी पैदा हुई।
दरअसल संबंधित व्यक्ति ने याचिका में मार्च 2020 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे कई मौकों पर अपनी नाबालिग बेटी के साथ बलात्कार करने संबंधी मामले में विशेष पॉक्सो अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि यह मानना मुश्किल है कि केवल इसी कारण से लड़की ने अपने पिता के खिलाफ इतना गंभीर आरोप लगाया। इसने आरोपी की अपील खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता का बयान विश्वास करने योग्य है।
वर्ष 2018 में मुंबई में अपने स्कूल में पुलिस दीदी जागरूकता कार्यक्रम के दौरान एक परामर्शदाता से बातचीत करते हुए नाबालिग लड़की ने आरोप लगाया था कि उसका पिता सालों से उसका यौन शोषण कर रहा है। लड़की उस समय कक्षा 10 की छात्रा थी। मामले में एक विशेष अदालत ने व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
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