Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

अब ‘सॉफ्ट पोस्टिंग’ नहीं

राजनीति में महिला आरक्षण पर बहस आज भी इस सवाल पर अटकी है कि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण आखिर कब मिलेगा। दूसरी ओर प्रशासनिक व्यवस्था धीरे-धीरे इस निष्कर्ष पर पहुंच चुकी है कि महिलाओं की भागीदारी अब केवल प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं रह गई है। अब यह प्रशासनिक जरूरत बन चुकी है। जिस व्यवस्था में कभी महिलाओं की भूमिका को ‘सॉफ्ट पोस्टिंग’ तक सीमित मानकर देखा जाता था, आज वही महिलाएं सबसे कठिन और संवेदनशील प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभाल रही हैं। एक समय यह धारणा गढ़ी गई थी कि प्रशासनिक सख्ती और निर्णय क्षमता पुरुषों का स्वाभाविक गुण है, लेकिन समय ने साबित कर दिया कि प्रशासनिक दक्षता का संबंध लिंग से तय नहीं हो सकता है। यह नेतृत्व क्षमता पर निर्भर करता है। सूबे में आईएएस अफसरों की हालिया तबादला सूची इस बदलाव की एक महत्वपूर्ण झलक देती है। 42 आईएएस अफसरों के तबादलों में 14 महिला अफसर शामिल रहीं, यानी लगभग 33 प्रतिशत। सामान्य परिस्थितियों में यह केवल एक आंकड़ा माना जा सकता था, लेकिन ऐसे समय में, जब देश महिला आरक्षण को लेकर तीखी राजनीतिक बहसों से गुजर रहा हो, तब यह संख्या महज संयोग नहीं लगती। यह बदलती प्रशासनिक सोच और संस्थागत विश्वास का संकेत देती है। मानो प्रशासन ने यह संदेश दे दिया हो कि महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर जितनी बहस राजनीति कर रही है, समाज और संस्थाएं उससे कहीं ज्यादा आगे बढ़ चुकी हैं। आंकड़े बताते हैं कि 1951 से 2020 तक भारतीय प्रशासनिक सेवा में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 13 प्रतिशत तक थी, लेकिन 2024 तक यह आंकड़ा बढ़कर 34 प्रतिशत तक पहुंच गया। यह आंकड़ा सत्ता संरचनाओं के भीतर महिलाओं की क्षमता पर बढ़ते भरोसे का प्रमाण है। प्रशासन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को केवल आरक्षण या प्रतिनिधित्व की भाषा में समझना अब अधूरा होगा। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की एक रिपोर्ट कहती है कि लोक प्रशासन में महिलाओं की उपस्थिति शासन को अधिक संवेदनशील, सहभागी और जवाबदेह बनाती है। वहीं इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन में पाया गया कि नीति-निर्माण और स्थानीय प्रशासन में महिलाओं की अधिक भागीदारी से पारदर्शिता बढ़ती है और भ्रष्टाचार की संभावनाएं कम होती हैं। असल में नौकरशाही का यह बदलाव राजनीति से ज्यादा व्यावहारिक है। राजनीति आज भी महिला भागीदारी को सीटों के गणित से मापती है, जबकि प्रशासन अब उसे परिणामों से मापने लगा है। यह बदलाव इसलिए भी बड़ा है, क्योंकि यहां महिलाओं को जगह दी नहीं गई है, उन्होंने ख़ुद अपनी जरूरत को साबित किया है। 

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नारी शक्ति

छत्तीसगढ़ बनने के बाद शायद यह पहली बार है, जब प्रशासनिक नक्शे पर नारी शक्ति इतनी स्पष्ट दिखाई दे रही है। राज्य के 33 जिलों में से 10 जिलों की कमान महिला कलेक्टरों के हाथ में है। यानी लगभग हर तीसरे जिले में सरकार का चेहरा एक महिला अफसर है। जरा तस्वीर देखिए- नारायणपुर में नम्रता जैन, बेमेतरा में प्रतिष्ठा ममगाई, कोंडागांव में नुपूर राशि पन्ना, सूरजपुर में रेना जमील, बलरामपुर-रामानुजगंज में चंदन संजय त्रिपाठी, बालोद में दिव्या उमेश मिश्रा, मोहला-मानपुर में तुलिका प्रजापति, कोरिया में रोक्तिमा यादव, एमसीबी में संतन देवी जांगड़े और सारंगढ़-बिलाईगढ़ में पद्मिनी भोई कलेक्टर की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। यह सूची केवल नामों की सूची नहीं है, बल्कि उस बदलती तस्वीर का दस्तावेज है, जिसमें प्रशासनिक महकमा पुरुष नेतृत्व की पारंपरिक परिभाषा से बाहर निकलता दिख रहा है। कलेक्टर जिले में सरकार का चेहरा होते हैं। सरकार की योजनाओं को कागज से जमीन पर उतारने की पहली इकाई कलेक्टर ही हैं। ऐसे में 10 जिलों में महिला कलेक्टरों की मौजूदगी सरकार का उन पर भरोसे का सार्वजनिक ऐलान लग रहा है। सूबे के 33 जिलों में से 10 जिलों में महिला कलेक्टरों की तैनाती का मतलब है कि कलेक्टर के कुल पदों में उन्हें करीब 30 फीसदी की हिस्सेदारी दिया जाना। नारी शक्ति को अब निर्माण की शक्ति मिल गई है। निर्माण विश्वास का, निर्माण संवेदनशील व्यवस्था का, निर्माण अनुशासन और पारदर्शिता का और निर्माण नए नेतृत्व का भी….

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खाकी शक्ति

सूबे में प्रशासनिक व्यवस्था के साथ-साथ कानून व्यवस्था के मोर्चे पर भी महिला अफसरों की मजबूत और प्रभावी मौजूदगी साफ दिखाई दे रही है। महिला पुलिस कप्तानों की तैनाती ने यह साबित किया है कि पुलिसिंग में संवेदनशीलता और सख्ती दोनों का संतुलन एक साथ संभव है। बलौदाबाजार में भावना गुप्ता ने अपने काम के बूते यह संदेश दिया है कि जिम्मेदारी परिस्थितियों की मोहताज नहीं होती। मैटरनिटी के दौरान भी उनकी सक्रियता बनी रही। मैटरनिटी लीव पर जाते-जाते उन्होंने सट्टा सिंडिकेट के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर सुर्खियां बटोरी। मैटरनिटी लीव पर होने की वजह से उनका प्रभार ओ पी शर्मा को सौंपा गया है, मगर खबर है कि जल्द ही उनकी वापसी होगी। बलौदाबाजार-भाटापारा जिले से पहले वह गौरेला-पेंड्रा-मारवाही, बेमेतरा और सरगुजा जिले की एसपी रह चुकी हैं। राजनांदगांव में अंकिता शर्मा की पहचान एक तेज-तर्रार और निर्णायक अफसर के रूप में बनी है। उनकी तैनाती के बाद अपराध के आंकड़ों में कमी और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण की चर्चा आम है। सट्टा, जुआ, शराब और रेत सिंडिकेट पर लगातार कार्रवाई ने यह एहसास कराया है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति अगर मजबूत हो तो संगठित अवैध नेटवर्क भी दबाव में आ जाते हैं। उनके सख्त रुख ने अपराधियों में कानून का भय पैदा किया है। राजनांदगांव से पहले बतौर एसपी उन्होंने खैरागढ़ और सक्ती जिला संभाला है। रायपुर ग्रामीण जैसे संवेदनशील इलाके की जिम्मेदारी श्वेता श्रीवास्तव सिन्हा के कंधों पर है। यह वही इलाका है, जहां मंत्रालय, वीवीआईपी आवास और एयरपोर्ट जैसे महत्वपूर्ण केंद्र स्थित हैं। ऐसे इलाके में कानून व्यवस्था संभालना केवल प्रशासनिक अनुभव ही नहीं, बल्कि सतत सतर्कता और संतुलित नेतृत्व की भी मांग करता है। फिलहाल उनके प्रशिक्षण पर होने के दौरान उनका प्रभार महिला अधिकारी मनीषा रावटे को सौंपा जाना यह बताता है कि पुलिस विभाग महिला नेतृत्व पर अपना भरोसा मजबूत कर चुका है। कुल जमा लब्बोलुआब यह है कि पुलिस महकमे में भी महिला अफसर नेतृत्व की नई परिभाषा गढ़ रही हैं। 

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ज्ञान का मंत्रालय

मनुष्य की प्रतिक्रिया उसकी समझदारी का परिचय दे देती हैं। अब जरा इस किस्से से सूबे के एक मंत्री की समझदारी का आकलन आप खुद ब खुद कर लीजिए। दरअसल हुआ यूं कि उनसे बोरे बासी के संदर्भ में एक राजनीतिक सवाल पूछा गया था। उन्होंने अपने जवाब में यह ज्ञान परोस दिया कि पुराने जमाने में मजदूरों के पास रेफ्रिजरेटर जैसी व्यवस्था थी नहीं, सो लोग रात का बचा हुआ चावल पानी में भिगोकर रखने लगे। सुबह उठकर उसे खाते और काम पर चले जाते। हकीकत यह है कि बोरे बासी सिर्फ रात का बचा चावल नहीं है।यह तो भूख और समझदारी के बीच का पुराना समझौता है। यह एक खाद्य संस्कृति है, जो समय के साथ विकसित हुई है। छत्तीसगढ़ में बोरे बासी, ओडिशा में पखाला, असम में पोइता भात, ये सब अलग-अलग नाम हैं, लेकिन इनके पीछे एक साझा समझ है, भोजन को संरक्षित करना, उसे मौसम और जीवनशैली के अनुसार ढालना और उससे पोषण लेना।अब विज्ञान भी इस पर मुहर लगा रहा है। किण्वित (fermented) चावल में प्राकृतिक प्रोबायोटिक होते हैं, जो पाचन तंत्र के लिए उपयोगी माने जाते हैं और इसमें विटामिन B12 जैसे तत्व भी पाए जाते हैं। यानी जो चीज कभी गरीबी की आदत समझी जाती थी, वह आज पोषण विज्ञान के अध्ययन का हिस्सा बन चुकी है। परंपराएं मजबूरी से शुरू हो सकती हैं, मगर समय के साथ वे संस्कृति और ज्ञान दोनों बन जाती हैं। अब मंत्री जी को भला ये बात कौन समझाए कि जब किसी सांस्कृतिक अभ्यास को केवल मजबूरी कहकर सीमित कर दिया जाता है, तो वह उसके सामाजिक, पोषणात्मक और ऐतिहासिक महत्व को भी छोटा कर देता है। खानपान की संस्कृति को बखूबी समझने वाले एक जानकार तक जब मंत्री जी की टिप्पणी पहुंची, तब उन्होंने दो टूक कहा कि उनका मंच ऊंचा है पर लगता है कि उनका विचार अब भी बुनियादी स्तर पर अटका हुआ है, क्योंकि ऊंचे पद से दिया गया सरल उत्तर भी अगर अपना वास्तविक संदर्भ खो दे, तो वह ज्ञान नहीं, केवल अधूरी जानकारी बनकर रह जाता है। फिलहाल मंत्री जी ज्ञान का ही मंत्रालय संभाल रहे हैं।

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रुतबा 

पुलिस महकमे में अफसरों के लिए नई गाड़ियां आई हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि अफसरों को पर्याप्त सुविधाएं दी जानी चाहिए। सुविधाएं सामर्थ्य बढ़ाती हैं, लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब सुविधा और विशेषाधिकार के बीच की रेखा धुंधली होने लग जाए। दरअसल मामला एक रेंज आईजी से जुड़ा है। आईजी साहब बीते कई हफ्ते या यूं कहे कई महीनों से चर्चा के केंद्र में बने हुए हैं। हाल की बात है, पीएचक्यू में एक अफसर गाड़ियों का हिसाब-किताब लगा रहे थे कि उन्हें पता चला कि रेंज आईजी के पास चार इनोवा क्रिस्टा गाड़ियां हैं। रेंज के चार जिलों से एक-एक गाड़ी उनके हिस्से आई है। सरकारी गाड़ियों के काफिले से उनका रुतबा बढ़ रहा है। दिलचस्प बात यह कि एक गाड़ी स्थायी रूप से राजधानी में तैनात रहती है और बाकी तीन रेंज मुख्यालय स्थित बंगले की शोभा बढ़ाती हैं। संयोग देखिए, परिवार में सदस्य भी कुल चार ही हैं। यानी हर सदस्य के हिस्से एक सरकारी गाड़ी। गणित वाकई शानदार है। सरकारी अफसर हैं, तो एक-दो गाड़ियों का इस्तेमाल व्यवस्था की मजबूरी मान लिया जाता है, लेकिन जब सुविधा जरूरत से आगे निकलकर संग्रह की शक्ल लेने लगे तब सवाल उठते हैं। आखिर सरकारी संसाधन सुविधा के लिए होते हैं, प्रदर्शन के लिए नहीं। यह सरकार के खजाने में एक तरह की चोट पहुंचाने जैसा है। आर्थिक चुनौतियों से जूझते जिस राज्य के महामहिम मर्सिडीज, टोयोटा वेलफायर और बीएमडब्ल्यू जैसी गाड़ियों की सवारी करते हो, वहां आईजी साहब के चार इनोवा क्रिस्टा रखने की चर्चा भी बेमानी हो जाती है। खैर, सबसे चिंताजनक बात तब होती है, जब सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग को सिस्टम सामान्य मानने लगे। सूबे में फिजूलखर्ची संस्कृति बन गई है। यहां अफसरों की गाड़ियों की संख्या जरूरत से तय न होकर उनके पद की हैसियत से तय होने लगी है। दूसरे उलझनों के बोझ में डूबी सरकार इस छोटे से बोझ को समझ नहीं पा रही। 

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अधूरा असर

‘पॉवर सेंटर’ की एक खबर का अधूरा असर है। अधूरा इसलिए की प्रभावशाली बच निकले और हर बार की तरह मातहत के हिस्से एफआईआर आ गई। खैर, एलपीजी की चोरी का मुद्दा उठाते हुए हमने यह बताया था कि प्रशासन और एजेंसी के बीच सांठगांठ से बड़ा खेल, खेल लिया गया। एक करोड़ रुपए की बंदरबांट हो गई। प्रशासन की निगरानी में छह कैप्सूल ट्रकों में भरा एलपीजी चुरा लिया गया था। मामले की तफ्तीश हुई और जिम्मेदार धर लिए गए। हमारी सूचना कहती है कि प्रशासनिक महकमे के उच्च पदों पर बैठे अफसरों तक की कुर्सी हिल गई होती, अगर अदृश्य शक्तियां बचाने नहीं आती। मगर सरकार का उसूल रहा है कि मुंडी देख-देख कर शिकार किया जाता है। उच्च पदों पर काबिज अफसर जद में आते तो उसूल टूट जाता। खैर, संगठित चोरी में हर किरदार ने चुपचाप अपनी भूमिका निभाई थी। छोटे किरदार जद में आ गए और बड़े किरदार छोड़ दिए गए।  

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