रायपुर। देश में बढ़ते जल संकट के बीच छत्तीसगढ़ एक अलग और सकारात्मक उदाहरण बनकर उभर रहा है। जहां कई राज्य पानी की कमी से जूझ रहे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ ने जल संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़कर नई दिशा दी है। “मोर गांव, मोर पानी” जैसे अभियान के जरिए यहां गांवों को केंद्र में रखकर पानी के प्रबंधन की पहल की गई है, जो न केवल स्थानीय जरूरतों को लक्षित करती है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी एक मॉडल के रूप में सामने आ रही है।
देश में पानी का मुद्दा अब सिर्फ सरकारी नीतियों और योजनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गांवों की रोजमर्रा की जरूरत और चिंता बन चुका है। कहीं कुएं सूख रहे हैं, कहीं हैंडपंप जवाब दे रहे हैं, तो कहीं बारिश का स्वरूप बदल गया है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहां जीवन खेती, जंगल और प्रकृति पर आधारित है, वहां जल संकट सीधे आजीविका और जीवन को प्रभावित करता है।
पिछले कुछ वर्षों में जल संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हुए हैं। तालाबों का निर्माण, पुराने जल स्रोतों का पुनर्जीवन और विभिन्न योजनाओं के माध्यम से विभिन्न तरह के प्रयास। लेकिन इन प्रयासों को एक समग्र दिशा देने और गांवों को केंद्र में रखने की आवश्यकता महसूस की गई। इसी सोच से “मोर गांव, मोर पानी” अभियान की शुरुआत हुई, जिसने जल संरक्षण को जनआंदोलन का रूप देने की दिशा में कदम बढ़ाया।
छत्तीसगढ़ में आदिवासी आबादी का बड़ा हिस्सा निवास करता है, जहां पानी सिर्फ संसाधन नहीं बल्कि जीवन का आधार है। ऐसे में यह स्पष्ट हुआ कि जल संरक्षण तभी सफल हो सकता है, जब लोग खुद इसे अपनी जिम्मेदारी समझें और सक्रिय भागीदारी निभाएं।
अभियान की शुरुआत संवाद और समझ से हुई। गांव-गांव में बैठकें आयोजित की गईं, प्रशिक्षण दिए गए और लोगों से सीधी बातचीत की गई। सरपंच, ग्रामीण, महिलाएं, स्वयं सहायता समूह और सामाजिक संगठन—सभी ने मिलकर इस पहल को आगे बढ़ाया। यह प्रक्रिया आदेश देने की नहीं, बल्कि सामूहिक समाधान खोजने की रही। यदि व्यवहार परिवर्तन के दृष्टिकोण से देखें, तो “मोर गांव, मोर पानी” केवल जल संरचनाओं के निर्माण का अभियान नहीं, बल्कि लोगों की सोच और व्यवहार में बदलाव लाने का प्रयास भी है।

व्यवहार विज्ञान के COM-B मॉडल के अनुसार किसी भी स्थायी बदलाव के लिए तीन तत्व आवश्यक होते हैं—Capability (क्षमता), Opportunity (अवसर) और Motivation (प्रेरणा)। इस अभियान में गांवों को प्रशिक्षण और जानकारी देकर उनकी क्षमता विकसित की गई, मनरेगा एवं अन्य योजनाओं के माध्यम से जल संरक्षण के लिए संसाधन और अवसर उपलब्ध कराए गए, तथा ग्राम सभाओं, महिलाओं की भागीदारी और स्थानीय सफल उदाहरणों के जरिए लोगों में पानी बचाने की प्रेरणा पैदा की गई। यही कारण है कि जल संरक्षण धीरे-धीरे सरकारी कार्यक्रम से आगे बढ़कर जनभागीदारी का आंदोलन बनता गया।
इसका सकारात्मक असर भी दिखने लगा। ग्राम सभाओं में पानी को लेकर खुलकर चर्चा होने लगी। लोगों ने खुद अपनी समस्याएं बताईं और समाधान सुझाए। इससे जल संरक्षण एक सरकारी कार्यक्रम न रहकर गांव की अपनी पहल बन गया।
एक महत्वपूर्ण कदम भूजल की स्थिति को सरल तरीके से लोगों तक पहुंचाना था। पंचायत भवनों की दीवारों पर जल स्तर की जानकारी लिखी गई, जिससे लोग समय के साथ पानी के स्तर में हो रहे बदलाव को समझ सकें। इससे जागरूकता के साथ जिम्मेदारी का भाव भी बढ़ा।
इसके बाद ज़मीनी स्तर पर काम तेज हुआ। मनरेगा और अन्य योजनाओं के तहत गांवों ने अपनी जरूरत के अनुसार डबरी, तालाब और अन्य जल संरचनाएं बनाईं। तकनीकी सहयोग जरूर लिया गया, लेकिन प्राथमिकता टिकाऊ और दीर्घकालिक समाधान को दी गई।
नीचे से ऊपर की निर्णय प्रक्रिया में ग्राम और जिले अपनी परिस्थितियों के अनुसार कार्य चुनने लगे। कांकेर में आजीविका डबरी, कोरिया में 5 प्रतिशत मॉडल, राजनांदगांव में इंजेक्शन वेल और दुर्ग में सोखता गड्ढे जैसे नवाचार सामने आए।
राज्य स्तर पर भी व्यापक प्रयास हुए हैं। पिछले वर्ष मनरेगा के तहत करीब 1300 करोड़ रुपये के जल संरक्षण कार्य किए गए। इसका परिणाम यह है कि कम वर्षा के बावजूद कई बांध इस बार भरे हुए हैं, जो निरंतर और सही दिशा में किए गए प्रयासों का संकेत है।
अभियान में यह सुनिश्चित किया गया कि कोई भी वर्ग पीछे न रहे। आदिवासी, अनुसूचित जाति, विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह और महिलाओं को प्राथमिकता दी गई। उनके खेतों में जल संरक्षण के कार्य किए गए, जिससे पानी के साथ आय के साधन भी बढ़े। हजारों परिवार इससे लाभान्वित हुए हैं।
महिलाओं की भागीदारी को विशेष महत्व दिया गया है। अब कार्यस्थलों पर लगे बोर्ड में महिलाओं और उनके समूहों के नाम दर्ज किए जाते हैं, जिससे उनका योगदान सामने आता है। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत बनाए जा रहे घरों में वर्षा जल संग्रहण को भी बढ़ावा दिया गया है। रायपुर के एनआईटी के सहयोग से कम लागत वाला मॉडल तैयार किया गया, जिसे लोगों ने स्वेच्छा से अपनाया। आज एक लाख से अधिक घरों में यह व्यवस्था स्थापित हो चुकी है।
कोरिया जिले का “5 प्रतिशत मॉडल” भी एक प्रेरक उदाहरण है, जिसमें किसानों को अपनी जमीन का एक हिस्सा जल संरक्षण के लिए समर्पित करने के लिए प्रेरित किया गया। इस पहल को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली।
असल में, कोई भी बदलाव तब तक टिकाऊ नहीं होता जब तक लोग उसे अपना न मान लें। “मोर गांव, मोर पानी” इसी सोच का परिणाम है, जहां काम लोगों के लिए नहीं, बल्कि लोगों के साथ मिलकर किया जा रहा है। और सबसे बड़ी उपलब्धि तब महसूस होती है, जब गांव का कोई व्यक्ति अपने भरे हुए तालाब या पुनर्जीवित कुएं को देखकर गर्व से कहता है—“ये हमने किया है।”


