हेमंत शर्मा, इंदौर। धार भोजशाला मामले में इंदौर हाईकोर्ट के फैसले के बाद श्रेय को लेकर नया विवाद सामने आया है। हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने विज्ञप्ति जारी कर दावा किया है कि भोजशाला को लेकर आया ऐतिहासिक फैसला उसकी रिट याचिका क्रमांक 10497/2022 में पारित हुआ है। मामले में संस्था की भूमिका को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है।
हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका
संस्था के प्रदेश उपाध्यक्ष आशीष गोयल ने कहा कि 15 मई 2026 को हाईकोर्ट ने भोजशाला को मां वाग्देवी का मंदिर मानते हुए महत्वपूर्ण निर्णय दिया। उनका दावा है कि इस फैसले का आधार हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस द्वारा दायर याचिका रही है। कहा गया है कि धार और आसपास के क्षेत्रों में सोशल मीडिया व अन्य माध्यमों से यह प्रचारित किया जा रहा है कि याचिकाकर्ता ही इस फैसले के प्रमुख पक्षकार हैं, जबकि न्यायालय के आदेश में स्पष्ट रूप से हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका का उल्लेख है।
पूजा की अनुमति से जुड़ा आदेश भी इसी प्रकरण में पारित
संस्था ने दावा किया कि दूसरी याचिका उसके मामले का ही विस्तार (ऑफशूट) थी और उसके अधिवक्ता ने भी हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के तर्कों को अपनाया था। संस्था ने दावा किया कि भोजशाला परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा कराया गया वैज्ञानिक सर्वेक्षण भी उसकी याचिका के आधार पर न्यायालय के आदेश से हुआ था। सर्वेक्षण की प्रक्रिया में संस्था की राष्ट्रीय अध्यक्ष रंजना अग्निहोत्री और याचिकाकर्ता आशीष गोयल की सक्रिय सहभागिता रही। प्रेसनोट में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट में भी संस्था लगातार पक्ष रखती रही। 22 जनवरी 2026 को बसंत पंचमी के अवसर पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा-अर्चना की अनुमति से जुड़ा आदेश भी इसी प्रकरण में पारित हुआ था।
जीत किसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे हिंदू समाज की
इसके बाद मामला पुनः हाईकोर्ट पहुंचा और सर्वे रिपोर्ट पर सुनवाई के बाद अंतिम निर्णय आया। हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने दावा किया कि मथुरा, काशी और भोजशाला समेत 200 से अधिक धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों में वह कानूनी लड़ाई लड़ चुकी है। संस्था का कहना है कि इन मामलों में किसी प्रकार का आर्थिक सहयोग नहीं लिया गया और मुकदमों का खर्च संगठन के सदस्यों ने स्वयं वहन किया। संगठन ने भोजशाला आंदोलन से जुड़े सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं और धार की जनता का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह जीत किसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे हिंदू समाज और धारवासियों के लंबे संघर्ष का परिणाम है।


