आशुतोष तिवारी, जगदलपुर: बस्तर संभाग में धान खरीदी के बाद अब हिसाब-किताब का बड़ा संकट सामने आया है। समर्थन मूल्य पर खरीदे गए धान के भौतिक सत्यापन में करीब 28 हजार 244 मीट्रिक टन धान गायब मिला है, जिसकी कीमत करीब 89 करोड़ 30 लाख रुपये आंकी गई है। अब इस कमी की भरपाई की जिम्मेदारी समिति प्रबंधकों और खरीदी प्रभारियों पर डाली जा रही है। जिला सहकारी बैंक की ओर से नोटिस जारी कर राशि जमा करने के लिए महज तीन महीने का समय दिया जा रहा है। तय समय में राशि जमा नहीं हुई तो FIR की चेतावनी भी दी जा रही है।

दरअसल, संभाग के सात जिलों के 382 धान खरीदी केंद्रों में करीब 13 लाख 74 हजार मीट्रिक टन धान की खरीदी हुई थी। इसमें से मिलर्स करीब 13 लाख 46 हजार मीट्रिक टन धान का उठाव कर चुके हैं, लेकिन उठाव और भौतिक सत्यापन के बाद करीब 28 हजार मीट्रिक टन धान का अंतर सामने आया है। अब सवाल सिर्फ धान के शॉर्टेज का नहीं, बल्कि उसकी भरपाई की जिम्मेदारी तय करने का है।

समितियों से वसूलने की प्रक्रिया शुरू

अधिकारियों के मुताबिक, शॉर्टेज की पूरी राशि समितियों से वसूलने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। सबसे ज्यादा कमी कांकेर में 13 हजार 281 मीट्रिक टन, कोंडागांव में 6 हजार 642 मीट्रिक टन, बस्तर में 4 हजार 687 मीट्रिक टन, बीजापुर में 2 हजार 131 मीट्रिक टन और सुकमा में 1 हजार 501 मीट्रिक टन बताई गई है।

वहीं समिति प्रबंधकों ने बिना कैमरे के सामने आए कहा कि समय पर धान का उठाव नहीं होना ही इस स्थिति की बड़ी वजह है। उनका कहना है कि जब संग्रहण केंद्रों और मिलर्स को शॉर्टेज में निर्धारित छूट दी जाती है, तो समितियों को भी ऐसी राहत मिलनी चाहिए।

समितियों का सवाल है कि चावल में सुखत का प्रावधान है तो धान खरीदी में यह व्यवस्था क्यों नहीं? यानी अब बस्तर में धान खरीदी का मामला सिर्फ शॉर्टेज तक सीमित नहीं है, बल्कि 89 करोड़ रुपये की वसूली और जिम्मेदारी तय करने तक पहुंच गया है। आने वाले तीन महीने में तय होगा कि यह रकम समितियां जमा करती हैं या फिर मामला FIR और कानूनी कार्रवाई तक जाता है।

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