पटना। बिहार के चिकित्सा इतिहास में एम्स पटना ने एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ते हुए एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के गैस्ट्रो सर्जरी विभाग की कुशल डॉक्टरों की टीम ने बिहार में पहली बार जीवित दाता (लाइव डोनर) से लिवर ट्रांसप्लांट करने में ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की है। इस जटिल और चुनौतीपूर्ण सर्जरी में 16 घंटे का लंबा समय लगा, जिसके बाद 54 वर्षीय मरीज को नया जीवनदान मिला। सबसे प्रेरणादायक बात यह है कि मरीज को उनके स्वस्थ लिवर का हिस्सा उनकी अपनी पत्नी ने दान किया है।
एम्स पटना के निदेशक डॉ. राजीव अग्रवाल ने एक प्रेस वार्ता में इस अभूतपूर्व सफलता की जानकारी साझा की और गैस्ट्रो सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डॉ. उत्पल आनंद तथा उनकी पूरी टीम को इस बड़ी उपलब्धि पर बधाई दी। यह पूरी सर्जिकल प्रक्रिया देश के जाने-माने संस्थान दिल्ली के मैक्स साकेत अस्पताल की विशेषज्ञ टीम की कड़ी निगरानी में संपन्न हुई।
ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस से जूझ रहे थे मरीज
पटना के रहने वाले 54 वर्षीय मरीज गंभीर रूप से ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस नामक बीमारी से पीड़ित थे। इस गंभीर बीमारी के चलते उनका लिवर पूरी तरह से खराब होने की स्थिति में पहुंच चुका था। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, मरीज की जान बचाने के लिए लिवर प्रत्यारोपण ही एकमात्र और अंतिम विकल्प बचा था। ऐसे कठिन समय में मरीज की पत्नी ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपने स्वस्थ लिवर का एक हिस्सा पति को दान करने का निर्णय लिया।
दान की इच्छा जताए जाने के बाद डोनर और मरीज दोनों के व्यापक स्तर पर चिकित्सकीय परीक्षण किए गए। जब सभी मेडिकल मानक सुरक्षित और अनुकूल पाए गए, तब प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। राहत की बात यह है कि सफल सर्जरी के बाद अब पति और पत्नी दोनों पूरी तरह स्वस्थ हैं। उल्लेखनीय है कि एम्स पटना आने से पहले मरीज ने दिल्ली के प्रतिष्ठित संस्थान आईएलबीएस (ILBS) में भी इलाज कराया था, जहां डॉक्टरों ने लाइव डोनर ट्रांसप्लांट करने से मना कर दिया था। इसके बाद मरीज ने एम्स पटना का रुख किया और यहां की चिकित्सा टीम ने इस असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को संभव कर दिखाया।
किफायती स्वास्थ्य सेवाएं और अनुदान योजना
इस पूरे ट्रांसप्लांटेशन पर कुल 15 लाख रुपए का खर्च आया। अंगदान के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाने और जरूरतमंदों को उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा सुलभ कराने के उद्देश्य से एम्स प्रशासन ने एक सराहनीय कदम उठाया है। संस्थान ने अपने पहले पांच लाइव डोनर लिवर ट्रांसप्लांट के लिए कुल खर्च का 90 प्रतिशत हिस्सा अनुदान (सब्सिडी) के रूप में देने का निर्णय लिया है। शेष 10 प्रतिशत खर्च ही मरीज के परिजनों द्वारा वहन किया गया है।
गौरतलब है कि एम्स पटना इससे पहले 25 सितंबर 2025 को बिहार का पहला कैडेवर या डिसिज्ड डोनर लिवर ट्रांसप्लांट भी सफलतापूर्वक कर चुका है। लाइव डोनर ट्रांसप्लांट की इस ऐतिहासिक सफलता के साथ एम्स पटना ने राज्य के मेडिकल क्षेत्र में एक नया मील का पत्थर स्थापित किया है।
कुशल डॉक्टरों की टीम का योगदान
इस जटिल और मैराथन सर्जरी को सफल बनाने में एम्स पटना के विभिन्न विभागों के विशेषज्ञों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लिवर ट्रांसप्लांट करने वाली कोर टीम में प्रमुख रूप से डॉ. उत्पल आनंद (अध्यक्ष, गैस्ट्रो सर्जरी विभाग), डॉ. कुणाल पराशर, डॉ. बसंत नारायण सिंह और डॉ. किसलय कांत शामिल रहे। इसके अलावा, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी विभाग से डॉ. राजीव नयन प्रियदर्शी, एनेस्थीसिया विभाग से डॉ. उमेश भदानी और गैस्ट्रो मेडिसिन विभाग से डॉ. रमेश कुमार सहित कई अन्य चिकित्सा कर्मी इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मुस्तैद रहे।


