सतीश सिंह, लखनऊ. अखिलेश यादव की एक टिप्पणी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को फिर गर्मा दिया है. राष्ट्रीय लोकदल नेता जयंत चौधरी को लेकर सपा अध्यक्ष के बयान के बाद मायावती और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी सपा पर हमला बोल दिया है. ऐसे में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर जाट वोट एक बार फिर चुनावी बहस के केंद्र में आ गया है.

पश्चिमी यूपी हमेशा से चौधरी चरण सिंह की विरासत और जाट-किसान राजनीति का गढ़ रहा है. यहां करीब 120 विधानसभा सीटों पर जाट मतदाताओं का प्रभाव माना जाता है. कई सीटें ऐसी हैं जहां यह समुदाय नतीजे तय कर सकता है. हालांकि अखिलेश के बयान को लेकर जयंत चौधरी ने कहा है कि उन्हें हमला ही करना था तो व्यक्तिगत करते, जाट समुदाय समुदाय को टारगेट करने की क्या जरूरत थी. जयंत की इस टिप्पणी को पश्चिम उत्तरप्रदेश में जाट अस्मिता से जोड़ कर देखा जा रहा है.

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दंगों के बाद बदला चित्र

2016 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद भाजपा ने पश्चिमी यूपी को प्रयोगशाला बनाकर वोटों की फसल काटी थी वह 2019 और 2024 के चुनावों में किसान आंदोलन, बदलते जाट-मुस्लिम रिश्ते के चलते एक बार फिर बदलता हुआ दिख रहा था. मगर बदलते समीकरण के बीच भाजपा को अखिलेश का बयान मददगार साबित हो सकता है. जयंत चौधरी की आरएलडी जाट समुदाय में पारंपरिक प्रभाव रखती है. भाजपा के साथ आने के बाद उसने एनडीए के सामाजिक आधार को और मजबूत किया है. ऐसे में अखिलेश यादव की टिप्पणी को सिर्फ व्यक्तिगत हमला नहीं, बल्कि पश्चिमी यूपी में जाट वोट की होड़ के रूप में देखा जा रहा है.

अखिलेश यादव का बयान कि हमने चवन्नी से रुपया बना दिया पर प्रतिक्रिया देते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह के परिवार का अपमान करने के लिए पूरे जाट समाज से अखिलेश यादव को माफी मांगनी चाहिए. उनका बयान पूर्णतः अमर्यादित, अशोभनीय और शर्मनाक है. वहीं प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने पलटवार करते हुए कहा कि केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी पर घटिया बयान देकर अपनी उसी छटपटाहट को उजागर कर दिया, जबकि ‘भारत रत्न’ चौधरी चरण सिंह का सैफई परिवार पर इतना क़र्ज़ है कि सपा बहादुर उसे चुका नहीं सकते. सपा बहादुर को जयंत चौधरी से तुरंत माफ़ी मांगनी चाहिए.

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अब सवाल यह है कि क्या एक बार फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश फिर जाट राजनीति की प्रयोगशाला बनेगा. भाजपा अपना पुराना आधार बचाना चाहती है, आरएलडी गठबंधन के साथ अपना प्रभाव बढ़ाना चाहती है और सपा किसान व युवा मुद्दों के जरिए सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रही है. ऐसे में अखिलेश यादव का बयान अब महज बयानबाजी नहीं रह गया है. यह पश्चिमी यूपी के बड़े चुनावी सवाल में बदल चुका है. आगे जाट वोट किस तरफ जाता है, यह गठबंधन, स्थानीय चेहरे, किसान मुद्दे और सामाजिक समीकरण तय करेंगे.

वरिष्ठ पत्रकार ऋषि मिश्रा कहते हैं कि विधानसभा चुनाव 27 के लिए यह मुद्दा पश्चिम उत्तर प्रदेश के लिए सबसे खास होगा. कुल मिलाकर समाजवादी पार्टी के लिए एक सेल्फ गोल हो गया है, जिसको देखना पड़ेगा कि समाजवादी पार्टी इसको आगे कैसे एड्रेस करती है. आम तौर से राष्ट्रीय लोकदल और किसान यूनियन के मुद्दे पर अगर कोई जाट नेता होता है तो उसके अपमान को पूरी जाट अस्मिता से जोड़ा जाता है, इसलिए इस बार भी समाजवादी पार्टी के लिए यह घातक हो सकता है.