वीरेंद्र कुमार/नालंदा। शहर के मोरा तालाब में आयोजित एक भव्य अभिनंदन समारोह में पूर्व सांसद आनंद मोहन ने बिहार की राजनीति, सत्ता परिवर्तन और प्रशासनिक व्यवस्था पर खुलकर अपने विचार रखे। उन्होंने साफ किया कि नीतीश कुमार के साथ उनके संबंध राजनीतिक नहीं, बल्कि पारिवारिक हैं।
नीतीश बड़े भाई, चमचा नहीं
आनंद मोहन ने कहा नीतीश कुमार मेरे नेता नहीं बल्कि बड़े भाई हैं। हम दोनों जेपी आंदोलन की उपज हैं। मैं उनका चमचा नहीं, बल्कि भाई हूं और भाई के प्रति मेरी मोहब्बत अटूट है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके इस संबंध को राजनीति के चश्मे से न देखा जाए।
सत्ता परिवर्तन पर गंभीर सवाल
बिहार में हुए हालिया सत्ता परिवर्तन को लेकर उन्होंने तल्ख तेवर अपनाए। आनंद मोहन ने सवाल उठाया कि जब एनडीए ने 2025-30 तक नीतीश कुमार के नेतृत्व का नारा दिया था और सरकार सुचारू रूप से चल रही थी तो रातों-रात उन्हें हटाने की नौबत क्यों आई? उन्होंने इसे जनादेश का अपमान और लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ करार दिया। उन्होंने शीर्ष नेतृत्व पर निशाना साधते हुए कहा कि सत्ता का दुरुपयोग कर कुछ लोग निजी साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं जबकि संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं की अनदेखी हो रही है।
परिवारवाद और विभागों पर नाराजगी
अपने ऊपर लग रहे परिवारवाद के आरोपों को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि यदि उन्हें केवल पद का मोह होता तो वे जनता के बीच संघर्ष करने के बजाय घर बैठते। साथ ही उन्होंने राज्य सरकार द्वारा विभागों के बंटवारे पर असंतोष जताया। उन्होंने पूछा कि उनके समाज के प्रतिनिधियों को हमेशा गौण या सीमित विभाग ही क्यों मिलते हैं? यह प्रश्न उन्होंने सत्ता के गलियारों में बैठे नीति-निर्माताओं से पूछा।
एनकाउंटर और बुलडोजर संस्कृति का विरोध
आरा में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर का जिक्र करते हुए आनंद मोहन ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि वे न तो बुलडोजर संस्कृति के समर्थक हैं और न ही एनकाउंटर के। उन्होंने तर्क दिया कि लोकतंत्र में पुलिस का काम अपराधी को पकड़कर अदालत के सामने पेश करना है न कि स्वयं न्याय करना। सजा देने का एकाधिकार केवल न्यायपालिका के पास है।
इस कार्यक्रम में अविनाश सिंह, अंकित सिंह और बिट्टू सिंह समेत सैकड़ों समर्थकों की मौजूदगी रही। आनंद मोहन के ये तेवर बिहार की राजनीति में आने वाले दिनों में नए समीकरणों की ओर संकेत दे रहे हैं।

