Dharm Desk – हिंदू धर्म की पावन परंपरा में सूर्यदेव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो हमें साक्षात स्वरूप में दर्शन देते हैं। नियमित प्रातःकाल भगवान सूर्य को जल अर्पित करना न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है बल्कि यह हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, आरोग्य और मानसिक शांति लाने का एक प्रमुख जरिया भी है। शास्त्रों में वर्णित है कि जो मनुष्य नियमानुसार सूर्यदेव को अर्घ्य प्रदान करता है।उसकी कुंडली में सूर्य ग्रह बलवान होता है और उसे समाज में यश मान सम्मान तथा तेज की प्राप्ति होती है।

लेकिन बहुत बार अनजाने में हम अर्घ्य देते समय कुछ मौलिक भूल कर बैठते हैं जिससे हमें इस पूजा का आध्यात्मिक दृष्टि से शारीरिक लाभ प्राप्त नहीं हो पाता।

अर्घ्य देने की विधि और जरूरी सावधानियां

पात्र का चुनाव

  • तांबे के लोटे का ही उपयोग करें। सूर्यदेव को जल चढ़ाने के लिए धातु का चयन सबसे पहला और महत्वपूर्ण चरण है। शास्त्रों के अनुसार तांबा सूर्यदेव की अतिप्रिय धातु है।
  • अर्घ्य देने के लिए हमेशा शुद्ध तांबे के लोटे का ही उपयोग करना चाहिए।
  • भूलकर भी प्लास्टिक, स्टील, कांच एल्युमीनियम या चांदी के बर्तन से सूर्यदेव को जल अर्पित नहीं करना चाहिए।
  • तांबे के लोटे से प्रवाहित जल से जो ऊर्जा तरंगें उत्पन्न होती हैं, वे माहौल और शरीर को पवित्र करती हैं।

अर्घ्य देने का सही समय और दिशा

अर्घ्य देने का परभाव समय और दिशा पर भी निर्भर करता है। अर्घ्य देने का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल सूर्योदय के दौरान होता है। जब सूर्य की किरणें हल्की लालिमा लिए होती हैं। अर्घ्य देते समय आपका मुख हमेशा पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। यदि किसी दिन बादलों के कारण सूर्यदेव दिखाई न दें तब भी पूर्व दिशा की ओर मुख करके ही मानसिक रूप से उनका स्मरण करते हुए जल अर्पित करना चाहिए।

अर्घ्य के जल को बनाएं पवित्र

  • सादे जल की तुलना में यदि जल में कुछ सात्विक वस्तुएं मिलाकर अर्घ्य दिया जाए तो इसका फल कई गुना तक बढ़ जाता है।
  • तांबे के लोटे में स्वच्छ जल भरकर उसमें ये सामग्री जरूर मिलना चाहिए।
  • रोली या लाल चंदन लाल रंग सूर्य तत्व का प्रतीक है जो जीवन में उत्साह लाता है।
  • गुड़हल या कोई भी लाल फूल सूर्यदेव को अत्यंत प्रिय है।
  • जल में थोड़ा सा अक्षत डालने से जीवन में संपन्नता और शुद्धता आती है।
  • जल में थोड़ा सा गुड़ मिलाने से कुंडली में मंगल और सूर्य दोनों दोष शांत होते हैं।

सूर्यदेव को अर्घ्य देने की सही मुद्रा

  • जल अर्पित करते समय शरीर की स्थिति अत्यंत पावन और अनुशासित होनी चाहिए।
  • दोनों हाथों से तांबे के लोटे को पकड़ें और उसे अपने मस्तक से ऊपर उठाएं।
  • लोटे से गिरती हुई जल धारा के बीच से सूर्यदेव के दर्शन करें।
  • जब प्रातःकालीन सूर्य की किरणें जल की धारा से छनकर हमारे शरीर पर पड़ती हैं तो इससे आंखों की ज्योति बढ़ती है और त्वचा संबंधी रोगों का नाश होता है।
  • इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि अर्घ्य का जल हमारे पैरों पर या किसी अशुद्ध जगह पर न गिरे। इसके लिए नीचे कोई गमला तुलसी का पौधा या शुद्ध पात्र रख लें ताकि जल उसमें एकत्र हो सके।

अर्घ्य के बाद करें सूर्य मंत्र का जाप

जल अर्पित करने की क्रिया बिना मंत्रोच्चार और नमन के अधूरी मानी जाती है।
सूर्य देव को जल चढ़ाते समय मंद स्वर में या मन ही मन इस मंत्र का जाप करना चाहिए
“ॐ सूर्याय नमः”, “ॐ घृणि सूर्याय नमः” या “ॐ आदित्याय नमः”
यदि संभव हो तो आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं।
जल अर्पित करने के बाद उसी जगह पर खड़े होकर घड़ी की सुई की दिशा में तीन बार घूमकर परिक्रमा करें।
अंत में पात्र या भूमि पर गिरे जल की कुछ बूंदों को अपनी अनामिका उंगली से छू करके अपने मस्तक कण्ठ और आंखों पर लगाना चाहिए तथा भगवान भास्कर से अपने उत्तम स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करना चाहिए।