Bastar News Update, बस्तर। राज्य गठन के शुरुआती दौर में शुरू हुई गांव गंगा योजना अब बस्तर के गांवों में सिर्फ पुरानी व्यवस्था की याद बनकर रह गई है। वर्ष 2000 में शुरू हुई इस योजना का मकसद गर्मी में सूखने वाले गांवों के तालाबों को बोरवेल से पानी देकर भरना था। तालाबों में पानी रहने से ग्रामीणों की निस्तारी जरूरतें पूरी होती थीं और मवेशियों को भी पानी उपलब्ध रहता था।
बस्तर में योजना के तहत स्थापित करीब 200 बोरवेल अब लंबे समय से बंद पड़े हैं। कई जगह मोटर और दूसरे उपकरण खराब हो चुके हैं तो कुछ स्थानों पर सामान चोरी होने की बात सामने आ रही है। योजना बंद होने का सीधा असर गांवों के तालाबों और वहां निर्भर ग्रामीण जीवन पर पड़ा है। गर्मी के दिनों में कई गांवों में निस्तारी के लिए पानी जुटाना बड़ी चुनौती बन जाता है।
तालाबों में पर्याप्त पानी नहीं रहने से स्थानीय स्तर पर मत्स्य पालन करने वाले लोगों को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि पुरानी व्यवस्था को सुधारकर दोबारा उपयोग में लाया जाए तो नई योजना पर होने वाला खर्च भी बच सकता है। दिलचस्प बात यह है कि अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में भी योजना को दोबारा शुरू करने की पहल नहीं हो सकी। अब ग्रामीण बंद पड़े बोरवेल और अधूरी पड़ी व्यवस्था को फिर से सक्रिय करने की मांग कर रहे हैं। सवाल यही है कि जब गांवों की जरूरत पूरी करने वाली व्यवस्था पहले से मौजूद है तो उसे दोबारा उपयोगी क्यों नहीं बनाया जा रहा।
सावन बीता पर बादल नहीं बरसे, 199 मिलीमीटर बारिश की कमी ने बढ़ाई किसानों की चिंता
बस्तर में सावन का आधे से ज्यादा समय गुजर गया, लेकिन इस बार मानसून की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं रही। जिले में अब तक 627.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है, जबकि सामान्य तौर पर इस अवधि में 826.5 मिलीमीटर बारिश होती है। इस लिहाज से बस्तर में करीब 199.1 मिलीमीटर यानी लगभग 24 प्रतिशत बारिश कम हुई है। सावन में लगातार बारिश से खेतों में पर्याप्त नमी बनी रहती है, लेकिन इस बार बारिश के बीच लंबे अंतराल देखने को मिल रहे हैं। कई इलाकों में हुई बारिश ने फसलों को राहत जरूर दी है, लेकिन नियमित बारिश नहीं होने से किसानों की चिंता बनी हुई है। खासकर धान की फसल के लिए खेतों में पर्याप्त पानी और नमी बनाए रखना जरूरी है।
बारिश की मौजूदा स्थिति का असर आगे चलकर खरीफ उत्पादन पर पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है। किसानों की उम्मीद अब भादो में होने वाली बारिश पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में अच्छी बारिश होती है तो मौजूदा कमी की काफी हद तक भरपाई हो सकती है। लेकिन बारिश का अंतराल लंबा रहा तो खेती की लागत और फसल प्रबंधन दोनों पर दबाव बढ़ सकता है। सावन में झड़ी के लिए पहचाने जाने वाले बस्तर में इस बार किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए हुए हैं। अब आने वाले कुछ सप्ताह खेती के लिहाज से बेहद अहम माने जा रहे हैं।
कुत्तों से बचकर कलेक्ट्रेट पहुंचा माउस डियर, वन विभाग ने जंगल में लौटाया
दंतेवाड़ा कलेक्टोरेट परिसर में अचानक पहुंचे माउस डियर ने लोगों का ध्यान खींचा तो वन विभाग तत्काल हरकत में आया।
बताया गया कि कुत्तों के पीछा करने से घबराया वन्यजीव अपनी जान बचाते हुए आबादी क्षेत्र में पहुंच गया था। कलेक्ट्रेट परिसर में उसे देखने के बाद लोगों ने इसकी सूचना वन विभाग को दी। सूचना मिलते ही वनकर्मी मौके पर पहुंचे और बिना किसी नुकसान के माउस डियर को सुरक्षित कब्जे में लिया। इसके बाद पशु चिकित्सा अधिकारी से उसका स्वास्थ्य परीक्षण कराया गया। जांच के दौरान वन्यजीव को स्वस्थ पाया गया और जरूरी देखरेख की गई।
स्वास्थ्य सामान्य होने के बाद उसे बचेली क्षेत्र के उपयुक्त प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया गया। बैलाडीला की पहाड़ियों से आबादी क्षेत्रों की ओर वन्यजीवों के भटककर आने की घटनाएं पहले भी सामने आती रही हैं। हाल के दिनों में मासोड़ी क्षेत्र में बाघ दिखाई देने के बाद अब माउस डियर के पहुंचने से वन विभाग की निगरानी भी महत्वपूर्ण हो गई है। माउस डियर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची में सूचीबद्ध संरक्षित वन्यजीव है। ऐसे में आबादी क्षेत्र में वन्यजीव मिलने पर उसे सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू करना जरूरी होता है। वन विभाग ने रेस्क्यू के बाद उसे वापस प्राकृतिक आवास में पहुंचाकर उसकी सुरक्षा सुनिश्चित की है।
जर्जर छज्जे ने छीनी छात्र की सुरक्षा, इलाज के ढाई लाख खर्च ने बढ़ाई परिवार की चिंता
बस्तर। नगर के सुभाष चौक स्थित जर्जर आंगनबाड़ी भवन का छज्जा गिरने से एक छात्र गंभीर रूप से घायल हो गया। स्वामी आत्मानंद इंग्लिश मीडियम स्कूल में कक्षा आठवीं में पढ़ने वाले छात्र के हाथ और पैर में गंभीर चोटें आई हैं। हादसे के बाद छात्र को उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया, जहां उसके इलाज में अब तक करीब ढाई लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। चिकित्सकों ने आगे भी उपचार और देखभाल की जरूरत बताई है। परिवार के लिए बच्चे के इलाज का बढ़ता खर्च अब बड़ी परेशानी बन गया है। स्थानीय लोगों के मुताबिक आंगनबाड़ी भवन लंबे समय से जर्जर हालत में था। भवन के कई हिस्सों की स्थिति खराब होने के बावजूद समय रहते उसकी मरम्मत नहीं कराई गई।
बारिश के मौसम में ऐसे पुराने भवनों से खतरा और बढ़ जाता है। हादसे के बाद स्थानीय लोगों ने क्षेत्र के सभी जर्जर सरकारी भवनों का सुरक्षा निरीक्षण कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि जोखिम वाले भवनों की पहचान कर समय रहते मरम्मत या वैकल्पिक व्यवस्था जरूरी है। घायल छात्र के परिवार ने भी इलाज के बढ़ते खर्च को देखते हुए प्रशासन से आर्थिक सहायता की मांग की है। अब यह हादसा जर्जर सरकारी भवनों की नियमित जांच और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा है।

440 बच्चों के लिए सिर्फ चार-चार शौचालय, भैरमगढ़ एकलव्य स्कूल की व्यवस्था पर सवाल
बीजापुर। जिले के भैरमगढ़ स्थित पीएमश्री एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय में मूलभूत सुविधाओं को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। परिजनों के अनुसार बालक और बालिका छात्रावास में करीब 220-220 विद्यार्थी रह रहे हैं। इसके बावजूद प्रत्येक छात्रावास में महज दो-दो शौचालय।उपलब्ध होने की बात कही गई है। इनमें से भी कई शौचालय खराब बताए जा रहे हैं, जिससे विद्यार्थियों को रोजमर्रा की परेशानी झेलनी पड़ रही है। हालात यह हैं कि कुछ विद्यार्थियों को शौच के लिए छात्रावास परिसर से बाहर जाने की मजबूरी बन रही है। इससे बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और गरिमा को लेकर गंभीर चिंता सामने आई है।
बालिका छात्रावास में सैनिटरी पैड की नियमित उपलब्धता नहीं होने की शिकायत भी परिजनों ने की है। अभिभावकों का कहना है कि आवासीय विद्यालय में बच्चों को स्वच्छता और स्वास्थ्य की पर्याप्त सुविधाएं मिलना जरूरी है। विद्यालय की व्यवस्थाओं को लेकर पहले भी प्रशासनिक स्तर पर शिकायतें और निरीक्षण सामने आ चुके हैं। सर्व आदिवासी समाज ने भी विद्यार्थियों की समस्याओं का तत्काल समाधान कराने की मांग उठाई है। वहीं सहायक आयुक्त ने शौचालय और सैनिटरी पैड से जुड़ी शिकायतों की जांच कराने और आवश्यक सुधार की बात कही है। अब निगाह इस बात पर है कि जांच के बाद विद्यालय की मूलभूत सुविधाओं में कितनी जल्दी सुधार होता है।
करोड़ों का अत्याधुनिक स्टूडियो, लेकिन हफ्ते में सिर्फ एक घंटे का बस्तर प्रसारण
जगदलपुर के धरमपुरा में बना अत्याधुनिक दूरदर्शन स्टूडियो अपनी क्षमता के मुकाबले बेहद सीमित उपयोग तक सिमटता नजर आ रहा है। करीब 34 साल पुराने इस स्टूडियो में बस्तर की स्थानीय संस्कृति और भाषाओं में कार्यक्रम तैयार किए जाते रहे हैं। हल्बी, भतरी, गोंडी, मुरिया, माड़िया, छत्तीसगढ़ी और हिंदी में कार्यक्रमों के जरिए स्थानीय कलाकारों को मंच मिलता था। लेकिन अब तैयार होने वाले कार्यक्रमों के प्रसारण का समय सप्ताह में सिर्फ दो दिन, आधा-आधा घंटा बताया जा रहा है। इस सीमित प्रसारण से बस्तर के कलाकारों को अपनी प्रतिभा बड़े मंच तक पहुंचाने का अवसर कम हो गया है। स्थानीय स्तर पर बस्तर अंचल के कार्यक्रमों का प्रसारण सप्ताह में कम से कम चार दिन करने की मांग लंबे समय से उठती रही है। दूसरी बड़ी चुनौती स्टूडियो में कर्मचारियों की कमी है।
कभी यहां 50 से अधिक कर्मचारी कार्यरत थे, लेकिन अब कई विभागों में कर्मचारियों की संख्या बेहद कम रह गई है। स्थानांतरण के बाद कर्मचारियों की कमी के चलते एक महीने तक कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग तक नहीं हो सकी। बताया जा रहा है कि स्थानांतरित किए गए कुछ कर्मचारियों को अस्थायी तौर पर वापस जगदलपुर भेजने की प्रक्रिया चल रही है। स्थानीय कलाकारों का सवाल है कि जब बस्तर की संस्कृति और भाषाओं को मंच देने के लिए इतना बड़ा स्टूडियो मौजूद है तो उसका पूरा उपयोग क्यों नहीं हो रहा। अब जरूरत स्टूडियो की तकनीकी क्षमता के साथ स्थानीय प्रतिभाओं को नियमित प्रसारण का अवसर देने की है।
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