Bastar News Update : सुकमा. नक्सल प्रभाव कम होने के बाद सुकमा के दूरस्थ गांवों में विकास की नई उम्मीद जगी थी, लेकिन तुमालपाड़ की तस्वीर कई सवाल खड़े कर रही है। गांव में सड़क निर्माण के लिए महीनों से पहाड़ काटकर खनन किया जा रहा है, जबकि आज तक यहां प्राथमिक स्कूल और आंगनबाड़ी शुरू नहीं हो सकी। ग्रामीणों का कहना है कि खनन और क्रशर प्लांट के लिए ग्राम सभा ने सहमति नहीं दी थी, फिर भी काम जारी है। आरोप है कि पर्यावरण और खनिज विभाग की जरूरी अनुमति के बिना ही गतिविधियां संचालित हो रही हैं। करीब 50 परिवारों वाले इस गांव में 20 से अधिक बच्चे नियमित शिक्षा से वंचित हैं। छोटे बच्चे दिनभर गांव में ही रहते हैं, जबकि कुछ परिवार मजबूरी में बच्चों को दूसरे गांव भेज रहे हैं। ग्रामीणों का सवाल है कि जब भारी मशीनें गांव तक पहुंच सकती हैं, तो स्कूल और आंगनबाड़ी क्यों नहीं। उनका मानना है कि सड़क तभी सार्थक होगी, जब उसके साथ शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं भी पहुंचें। शिक्षा विभाग का कहना है कि तुमालपाड़ समेत 19 नए प्राथमिक विद्यालयों का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। प्रस्ताव स्वीकृत होने तक बच्चों को नजदीकी पोटाकेबिन, आश्रम और छात्रावासों में प्रवेश दिलाने की बात कही गई है। अब गांव के लोग विकास के दावों से ज्यादा जमीन पर शिक्षा की शुरुआत का इंतजार कर रहे हैं। तुमालपाड़ की कहानी बता रही है कि अधूरा विकास केवल सड़क से नहीं, बल्कि स्कूल की घंटी से पूरा होगा।
सामाजिक अनुशासन से अपराध पर लगाम, अनोखी परंपरा बनी मिसाल
जगदलपुर. बस्तर के बास्तानार-कोड़ेनार क्षेत्र में कानून से पहले सामाजिक व्यवस्था का प्रभाव आज भी मजबूत माना जाता है। यहां दंडामी माड़िया समाज वर्षों पुरानी परंपरा का पालन करता आ रहा है। यदि कोई व्यक्ति अपराध के कारण जेल जाता है या सार्वजनिक रूप से अपमानित होता है, तो उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। बहिष्कृत व्यक्ति तब तक सामाजिक आयोजनों में शामिल नहीं हो सकता, जब तक पूरे समाज को सामूहिक भोज न दे। इस भोज में सैकड़ों लोग शामिल होते हैं और आयोजन में हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं। कई परिवारों को इसके लिए कर्ज लेना या जमीन गिरवी रखना पड़ता है। ग्रामीणों का मानना है कि यही सामाजिक दंड लोगों को अपराध से दूर रहने के लिए प्रेरित करता है। इसी कारण क्षेत्र के कई गांवों में चोरी और हिंसक घटनाएं अपेक्षाकृत कम देखने को मिलती हैं। ग्रामीण बताते हैं कि यहां कई घरों में आज भी ताले लगाने की जरूरत महसूस नहीं होती। कोड़ेनार थाना क्षेत्र के दर्जनों गांवों में यह सामाजिक व्यवस्था अब भी प्रभावी मानी जाती है। हालांकि आधुनिक कानून व्यवस्था के दौर में इस परंपरा को लेकर अलग-अलग राय भी सामने आती है। फिर भी यह व्यवस्था बस्तर की सामाजिक संरचना और सामुदायिक अनुशासन की एक अलग पहचान बनी हुई है।
नकली डेयरी उत्पाद बेचने वालों की खैर नहीं
जगदलपुर. प्रदेश सरकार द्वारा डेयरी एनालॉग उत्पादों पर प्रतिबंध के बाद बस्तर जिले में भी कार्रवाई तेज हो गई है। खाद्य सुरक्षा विभाग ने होटल, रेस्टोरेंट और खाद्य प्रतिष्ठानों में सघन जांच अभियान शुरू किया है। टीमें संदिग्ध डेयरी उत्पादों के उपयोग और बिक्री की लगातार निगरानी कर रही हैं। ऐसे उत्पादों पर विशेष नजर रखी जा रही है, जिनमें दूध की जगह वनस्पति वसा या अन्य गैर-दुग्ध तत्वों का उपयोग किया जाता है। इन उत्पादों को पनीर, क्रीम या मक्खन जैसे असली डेयरी उत्पाद बताकर बेचने पर कार्रवाई होगी। खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि नियमों के उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। व्यवसायियों से गुणवत्ता मानकों और लेबलिंग नियमों का पालन करने की अपील की गई है। उपभोक्ताओं को भी खरीदारी से पहले उत्पाद की जानकारी जांचने की सलाह दी गई है। अभियान का उद्देश्य केवल कार्रवाई नहीं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा भी है। त्योहारी और विवाह सीजन को देखते हुए जांच को और तेज किया जा रहा है। विभाग का कहना है कि मिलावट और भ्रामक उत्पादों के लिए जिले में कोई ढील नहीं दी जाएगी। अब बस्तर में खाद्य सुरक्षा को लेकर निगरानी पहले से अधिक सख्त नजर आ रही है।
बाढ़ ने विकास की रफ्तार रोकी, अब पुनर्वास सबसे बड़ी चुनौती
नारायणपुर. अबूझमाड़ में वर्षों बाद विकास की जो उम्मीद जगी थी, उसे हालिया बाढ़ ने बड़ा झटका दिया है। 29 जुलाई की रात आई तेज बाढ़ ने ब्रेहबेड़ा और कदेर गांवों में भारी तबाही मचाई। सबसे ज्यादा नुकसान ब्रेहबेड़ा में हुआ, जहां कई मकान पूरी तरह बह गए। घरों के साथ अनाज, कपड़े, दस्तावेज और आजीविका का सामान भी पानी में समा गया। इस त्रासदी में दो मासूम बच्चों की मौत ने पूरे इलाके को शोक में डुबो दिया। कई परिवार आज भी खुले आसमान या अस्थायी आश्रयों में रहने को मजबूर हैं। बाढ़ से सड़कें और पुल-पुलिया क्षतिग्रस्त होने के कारण राहत पहुंचाना भी चुनौती बना हुआ है। हाल के महीनों में बने कई पक्के मकानों को भी नुकसान पहुंचा है। ग्रामीणों का कहना है कि केवल राहत सामग्री नहीं, बल्कि स्थायी पुनर्वास की जरूरत है। आजीविका बहाली और टूटे संपर्क मार्गों का पुनर्निर्माण भी प्राथमिकता होना चाहिए। अबूझमाड़ की यह आपदा केवल प्राकृतिक संकट नहीं, बल्कि विकास यात्रा की कठिन परीक्षा भी बन गई है। लोगों की सबसे बड़ी उम्मीद अब समयबद्ध राहत और नए सिरे से जीवन शुरू करने की है।
गौरवपथ की बदहाली बनी हादसों की वजह
दंतेवाड़ा. लौह नगरी में बारिश के बाद सड़कों की हालत लोगों की चिंता बढ़ा रही है। गौरवपथ और पुराना मार्केट पुल क्षेत्र में बड़े-बड़े गड्ढे हादसों का कारण बन रहे हैं। बारिश का पानी भर जाने से गड्ढों का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। दोपहिया वाहन चालक फिसलकर गिर रहे हैं और छोटे वाहन भी प्रभावित हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि रोज दुर्घटनाएं हो रही हैं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं दिख रहा। पेंचवर्क होने के बावजूद सड़क दोबारा खराब होने पर गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं। पुराना मार्केट पुल के आसपास कीचड़ ने आवाजाही और मुश्किल बना दी है। राहगीरों का कहना है कि सड़क सुधार केवल कागजों तक सीमित नजर आता है। क्षेत्र से रोज जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी गुजरते हैं, फिर भी हालात जस के तस हैं। हाल ही में एक बुजुर्ग पानी भरे गड्ढे में गिर गए और उनका सामान सड़क पर बिखर गया। लोगों का कहना है कि किसी बड़े हादसे से पहले सड़क की मरम्मत जरूरी है। अब मांग उठ रही है कि अस्थायी नहीं, बल्कि टिकाऊ और गुणवत्तापूर्ण मरम्मत की जाए।

ट्रैफिक नियमों की अनदेखी से बढ़ रही शहर की मुश्किलें
जगदलपुर. शहर की सबसे बड़ी समस्याओं में शामिल पार्किंग व्यवस्था अब ट्रैफिक जाम का प्रमुख कारण बनती जा रही है।
सड़कों पर बनाई गई पीली पार्किंग पट्टियों और संकेतकों की लगातार अनदेखी की जा रही है। कई वाहन चालक सुविधानुसार सड़क किनारे वाहन खड़े कर देते हैं, जिससे आवागमन प्रभावित होता है। भीड़भाड़ वाले इलाकों में प्रतिबंधित समय के दौरान भी भारी वाहनों की आवाजाही जारी रहती है। सुबह से शाम तक प्रतिबंध के बावजूद बड़े ट्रक व्यस्त बाजारों में प्रवेश करते देखे जा रहे हैं। यातायात व्यवस्था पर इसका सीधा असर आम लोगों को झेलना पड़ रहा है। कुछ पुलिसकर्मियों का कहना है कि कार्रवाई के दौरान प्रभावशाली लोगों का दबाव भी सामने आता है। इससे नियमों का सख्ती से पालन कराना चुनौती बन जाता है। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि केवल बोर्ड लगाने से व्यवस्था नहीं सुधरेगी। नियम तोड़ने वालों पर लगातार और निष्पक्ष कार्रवाई जरूरी है। यातायात व्यवस्था तभी बेहतर होगी, जब प्रशासन और नागरिक दोनों अपनी जिम्मेदारी निभाएं। शहर की बढ़ती आबादी के बीच अनुशासित पार्किंग और ट्रैफिक प्रबंधन अब समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है।
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