लखनऊ. राजनीति में चित्र कभी-कभी वक्तव्यों से अधिक बोलते हैं. मंच, माइक, ज्ञापन, करारनामे, इनकी अपनी मर्यादा है. मगर एक सहज मुस्कान, एक विद्यार्थी की सेल्फी और मुख्यमंत्री के निकट खड़े होकर कैद किया गया एक क्षण, अलग ही संदेश दे जाता है. आज लखनऊ में ऐसा ही एक दृश्य दिखा. जापान के यामानाशी प्रांत से आए एक जापानी विद्यार्थी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ सेल्फी ली. योगी भी मुस्कराए. न कोई औपचारिकता का बोझ, न सत्ता की दूरी का आभास. पीछे तिरंगा. दीवारों पर राष्ट्रनायकों के चित्र. बीच में आस्था के प्रतीक “श्री राम”, आगे एक जापानी छात्र और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ. यह केवल फोटो नहीं थी. यह नई कूटनीति का लघु दृश्य था.

जापान के यामानाशी प्रांत के राज्यपाल कोटारो नागासाकी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल लखनऊ आया. उनके साथ जापानी स्टूडेंट भी थे. साथ ही लखनऊ के विद्यार्थी भी इस संवाद का हिस्सा बने. उद्देश्य केवल शिष्टाचार भेंट नहीं था. विद्यार्थी संवाद, सांस्कृतिक परिचय और परस्पर सहयोग की नींव रखना भी था. जापान का नाम लेते ही मन में रेल की घड़ी जैसी समयबद्धता, कारखानों का अनुशासन और तकनीक का कौशल उभरता है. उत्तर प्रदेश का नाम आते ही राम की अयोध्या, बुद्ध का सारनाथ, काशी की अनश्वरता और ताज का सौन्दर्य. दोनों में अंतर दिखता है. मगर भविष्य का सूत्र इन्हीं भिन्नताओं में छिपा है. जापान उत्तर प्रदेश को अनुशासन और तकनीक दे सकता है. उत्तर प्रदेश जापान को अपनी सभ्यता का आत्मीय स्पर्श दे सकता है.

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उत्तर प्रदेश और यामानाशी के संबंध कोई आकस्मिक प्रसंग नहीं हैं. उद्योग, पर्यटन, व्यावसायिक शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और हरित हाइड्रोजन जैसे विषयों पर दोनों पक्ष पहले से संवादरत हैं. योगी की जापान यात्रा में भी कौशल-विकास और तकनीकी संस्थानों के छात्रों के प्रशिक्षण की संभावनाओं पर चर्चा हुई थी. सोचें जरा. कभी राष्ट्रों की निकटता राजदूतों की बंद बैठकों में मापी जाती थी. अब उसका एक पैमाना “सेल्फी” भी है. पहले दस्तावेजों पर हस्ताक्षर होते थे, फिर तस्वीर निकलती थी. अब तस्वीर पहले फैलती है, जो जिज्ञासा पैदा करती है, ये कौन हैं, कहां से आए हैं, किसलिए मिले हैं?

युग बदल गया है. कूटनीति की पुरानी परिभाषा में मंत्री, अधिकारी और अनुवादक प्रमुख होते थे. नई परिभाषा में विद्यार्थी भी हैं. कैमरा भी है. सोशल मीडिया भी है. और एक तस्वीर भी है. योगी आदित्यनाथ की सार्वजनिक छवि प्रायः अनुशासन, प्रशासन और कठोर निर्णयों से जुड़ती रही है. भगवा वेश, दृढ़ वाणी और शासन की सक्रियता, यही उनकी पहचानी हुई मुद्रा रही. मगर इस चित्र में एक अन्य पक्ष उभरता है. एक ऐसा मुख्यमंत्री, जो विद्यार्थियों के उत्साह में सहभागी है, जो औपचारिक बैठक को सहज मानवीय क्षण में बदलने देता है.

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सार्वजनिक जीवन में पहुंच की अनुभूति भी राजनीति का अंग है. खासकर उस पीढ़ी के लिए जो भाषण से पहले तस्वीर देखती है, समाचार से पहले वीडियो साझा करती है और नेतृत्व को दूरी से नहीं, संवाद से परखना चाहती है. सेल्फी लेना आज का अभिवादन है. यह स्मृति भी है, प्रमाण भी. उस जापानी छात्र के लिए यह भारत यात्रा का संस्मरण बनेगी. उत्तर प्रदेश के लिए यह संदेश होगा कि वह केवल पुरातन गौरव का प्रदेश नहीं, वैश्विक युवा संवाद का भी सहभागी है.

कल तक वे जापानी छात्र पुस्तकों में ताजमहल पढ़ते होंगे. आज संगमरमर की उस इमारत के सामने खड़े हैं. अयोध्या उनके लिए संभवतः रामकथा का नाम रही होगी. अब वह निकट का भूगोल है. आगे काशी है, जहां समय ठहरता नहीं, सहस्राब्दियों के साथ बहता है. और सारनाथ है, जहां बुद्ध ने करुणा का पहला उपदेश दिया था. कूटनीति की असली पाठशाला शायद यही है, जब नक्शे पर बना देश आंखों के सामने जीवित हो उठे. फिर भी केवल चित्रों से राष्ट्रों के रिश्ते नहीं बनते. मुस्कान स्वागत करती है, संस्थाएं संबंधों को टिकाऊ बनाती हैं. विद्यार्थी आदान प्रदान तभी सार्थक होगा, जब उसके साथ भाषा, शिक्षण, छात्रवृत्ति, तकनीकी प्रशिक्षण, शोध, सहयोग और रोजगार के वास्तविक अवसर जुड़ें.

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उत्तर प्रदेश के युवाओं के सामने कौशल, उच्च शिक्षा और रोजगार की चुनौतियां हैं. जापान के पास तकनीक, औद्योगिक अनुशासन और प्रशिक्षण की दीर्घ परंपरा है. यदि यामानाशी और उत्तर प्रदेश का संपर्क इन क्षेत्रों में ठोस परिणाम देता है, तो यह सेल्फी केवल सोशल मीडिया का प्रसंग नहीं रहेगी. यह एक बड़ी साझेदारी का प्रारंभिक चित्र कही जाएगी. लखनऊ में खिंची तस्वीर इसलिए महत्वपूर्ण है. उसमें प्रोटोकॉल है, पर बोझिल नहीं. उसमें सत्ता है, पर दूरी नहीं. उसमें भारत है, जापान है, और सबसे बढ़कर, आने वाला कल है.

-के. विश्वदेव राव