भिवानी में भारत मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय मुस्लिम मोर्चा ने देश के सामाजिक-राजनीतिक माहौल और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के खिलाफ प्रदर्शन कर जिला अधिकारी के माध्यम से राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजा।
अजय सैनी, भिवानी। देश में लगातार बिगड़ते सामाजिक-राजनीतिक माहौल, धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न और संवैधानिक अधिकारों पर हो रहे आघात के खिलाफ भारत मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय मुस्लिम मोर्चा ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। संगठन द्वारा बुधवार को भिवानी में प्रदर्शन कर जिला अधिकारी के माध्यम से राष्ट्रपति को एक 11 सूत्रीय मांग पत्र भेजा गया। इस मांग पत्र में मुख्य रूप से मुसलमानों की मॉब लिंचिंग, फर्जी गौकशी के नाम पर प्रताड़ना, धार्मिक स्थलों पर हमले और हाल ही में चलती ट्रेन में बिहार के मुफ्ती तौसीफ रजा की हुई हत्या जैसे गंभीर मुद्दों पर त्वरित कार्रवाई की मांग की गई है।
संविधान के सिद्धांतों और सामाजिक सौहार्द पर आघात का आरोप
इस पूरे मामले और राष्ट्रव्यापी चिंता को रेखांकित करते हुए भारत मुक्ति मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष रमेश दहिया ने कहा कि आज देश का वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य बेहद चिंताजनक हो चुका है। बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर द्वारा दिए गए संविधान के मूल सिद्धांतों, सामाजिक सौहार्द और नागरिक समानता पर सीधे आघात किए जा रहे हैं। अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुस्लिम और ईसाई समाज के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा की जा रही है। भारत मुक्ति मोर्चा देश के बहुलतावादी ढांचे को बिखरने नहीं देगा और इसके लिए हम लोकतांत्रिक व शांतिपूर्ण मार्ग से राष्ट्रपति महोदय से इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप की मांग करते हैं।
सीएए, यूसीसी और वक्फ संशोधन अधिनियम को रद्द करने की मांग
प्रदेश उपाध्यक्ष रमेश दहिया ने आगे कहा कि सरकार को तुरंत अपनी नीतियों और रवैये में सुधार करना होगा, अन्यथा संगठन इस आंदोलन को और अधिक उग्र रूप देने के लिए मजबूर होगा। उन्होंने मांग की कि सीएए, यूसीसी और वक्फ संशोधन अधिनियम-2025 जैसे कानूनों को तत्काल रद्द किया जाए, क्योंकि ये देश की बहुलतावादी पहचान पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 27, 28 और 29 का पूर्ण पालन हो ताकि पूजा, प्रबंधन और शिक्षा के अधिकारों में कोई हस्तक्षेप न हो। भीड़ द्वारा मुसलमानों और ईसाइयों को निशाना बनाकर की जा रही हत्याओं और फर्जी गौकशी के मामलों में त्वरित व कठोर कार्रवाई की जाए।
लंबित सिफारिशें लागू करने और जातिगत जनगणना पर जोर
शक और झूठे आरोपों के आधार पर जेलों में बंद मुस्लिम व ईसाई युवाओं, स्कॉलर्स, पास्टर्स और उलमा-ए-दीन को निष्पक्ष जांच कर तुरंत रिहा किया जाए। धर्म आधारित अन्याय और अत्याचार को रोकने के लिए कम्यूनल वायलेंस प्रिवेंशन एक्ट तुरंत लागू हो। मस्जिद, मदरसा, दरगाह, चर्च, बौद्ध विहार और गुरुद्वारों पर हो रहे हिंसक हमलों को रोकने के लिए कठोर कदम उठाए जाएं। ‘प्लेस ऑफ वरशिप एक्ट 1991’ को कड़ाई से लागू कर सभी धार्मिक स्थलों की 15 अगस्त 1947 वाली स्थिति बरकरार रखी जाए। अनुच्छेद-341 (3) की असंवैधानिक पाबंदी को हटाकर धर्म के आधार पर आरक्षण से वंचित करने का खेल बंद किया जाए।
मांगें पूरी न होने पर बड़े जन-आंदोलन की चेतावनी
देश में सभी जातियों और वर्गों की जाति आधारित गिनती कराई जाए और एससी, एसटी, ओबीसी व माइनॉरिटी समाज को जनसंख्या के अनुपात में हिस्सेदारी दी जाए। वर्ष 1983 से 2014 तक की गोपाल सिंह, सच्चर, मिश्रा और कुंडू कमीशन की लंबित सिफारिशों को बिना किसी देरी के लागू किया जाए। समाज में धर्म और जाति के नाम पर सांप्रदायिक नफरत व हिंसा फैलाने वाले संगठनों को प्रतिबंधित किया जाए। रमेश दहिया ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि इन 11 सूत्रीय मांगों पर निर्देश जारी नहीं किए गए, तो लोकतंत्र और नागरिक अधिकार खतरे में पड़ जाएंगे। इस अवसर पर रमेश दहिया, सूबेदार राजमल, बहमनी, हवा सिंह सांगा, दीपक जांगड़ा, कृष्णै ग्रेवाल, जय भीम बवानीखेड़ा, मनोज कुमार, सुमित कुमार, सत्यवान, जयवीर व अन्य लोग मौजूद रहे।

