बिहार में दक्षिण-पश्चिम मानसून पूरी तरह सक्रिय हो चुका है, जिसके चलते राज्य के मौसम में लगातार तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। एक तरफ जहां कई जिले भारी बारिश और वज्रपात की चपेट में हैं, वहीं दूसरी तरफ आधा दर्जन से अधिक नदियां उफान पर होने के कारण भीषण बाढ़ ने विकराल रूप ले लिया है। मौसम विभाग की चेतावनियों के बीच आपदा प्रबंधन और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।
मौसम का मिजाज और भारी बारिश का अलर्ट
राज्य के विभिन्न हिस्सों में मौसम का मिजाज लगातार बदल रहा है। सुपौल जिले में सुबह के समय तीखी धूप खिली रही, लेकिन शाम ढलते ही अचानक आसमान में घने बादल छा गए और झमाझम बारिश शुरू हो गई। मौसम विज्ञान केंद्र, पटना ने आज बुधवार को राज्य के 16 जिलों में बारिश का नया अलर्ट जारी किया है।
इनमें से 5 जिलों में भारी बारिश की आशंका जताई गई है, जिसके मद्देनजर प्रशासन को हाई अलर्ट पर रखा गया है। इसके अलावा 11 जिलों के लिए यलो अलर्ट जारी किया गया है, जहां 30 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने, हल्की से मध्यम बारिश होने तथा आकाशीय बिजली (वज्रपात) गिरने की प्रबल संभावना है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्वानुमान के अनुसार, आगामी 10 सितंबर तक राज्य में मौसम का यह मिजाज ऐसा ही बना रहेगा।
वज्रपात और बाढ़ से भारी तबाही, कई मौतें
खराब मौसम और आकाशीय बिजली का कहर आम जनजीवन पर भारी पड़ रहा है। अररिया जिले में वज्रपात की चपेट में आने से 3 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई है, जिससे मृतकों के परिवारों में कोहराम मच गया है।
दूसरी ओर, बाढ़ की स्थिति बेहद गंभीर बनी हुई है। बिहार के 13 जिलों के लगभग 34 लाख लोग बाढ़ के पानी से घिरे हुए हैं। नेपाल और पडोसी राज्यों में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के कारण बिहार की 9 से ज्यादा नदियां उफान पर हैं और खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। राजधानी पटना से सटे इलाकों में पुनपुन नदी का जलस्तर पिछले 24 घंटों के भीतर 9 सेंटीमीटर और बढ़ गया है। श्रीपालपुर के पास पुनपुन नदी का पानी वर्तमान में खतरे के निशान से 2.95 मीटर ऊपर बह रहा है। इसके साथ ही दरधा और महतमाईन नदियां भी उफान पर हैं, जिससे निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा और गहरा गया है। भोजपुर जिले में बाढ़ के पानी में डूबने से 4 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जो इस आपदा की विभीषिका को बयां करती है।
राहत शिविरों की जमीनी हकीकत और दावों की पोल
सरकार और जिला प्रशासन की ओर से बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत शिविर संचालित करने और युद्ध स्तर पर मदद पहुंचाने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन मैदानी हकीकत इन दावों से कोसों दूर है। जमीनी स्तर पर पीड़ितों को मूलभूत सुविधाएं तक मय्यड़ नहीं हो पा रही हैं।
राहत शिविरों में दोनों वक्त भोजन के रूप में दाल-भात और सब्जी मिलने का दावा तो किया जा रहा है, लेकिन बाढ़ की मार झेल रहे परिवारों की अन्य बुनियादी जरूरतें पूरी तरह नजरअंदाज हो रही हैं। शिविरों में छोटे बच्चों के लिए दूध, महिलाओं के लिए सैनिटरी पैड्स और चेंजिंग रूम जैसी जरूरी सुविधाओं का भारी संकट बना हुआ है। इसके अलावा बेजुबान मवेशियों के लिए चारे की कोई मुकम्मल व्यवस्था न होने से पशुपालक भी लाचार हैं। कई जिलों में तो स्थिति यह है कि कागजों पर संचालित होने वाली राहत रसोइयां धरातल पर पूरी तरह नदारद हैं, जिससे बाढ़ पीड़ितों का गुस्सा और निराशा लगातार बढ़ती जा रही है।



