बिहार में अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव की पूरी तस्वीर बदलने जा रही है। राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा 2023 की जाति आधारित गणना के डेटा के आधार पर नया परिसीमन और आरक्षण रोस्टर लागू किया जाएगा, जिसका असर सीधे तौर पर आगामी चुनावों के जातीय समीकरणों और सीटों की संख्या पर पड़ेगा।

मुखिया के पदों में भारी बढ़ोतरी

​राज्य में 10 साल बाद नया आरक्षण रोस्टर लागू होने से पंचायतों की संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। परिसीमन के बाद मुखिया के पदों की संख्या वर्तमान में 8,053 से बढ़कर लगभग 13,000 तक पहुंच जाने की संभावना है।

​जातीय समीकरणों और आरक्षण में बदलाव

​नया रोस्टर लागू होने से उन सीटों पर बड़ा बदलाव आएगा, जहां पहले सामान्य वर्ग का वर्चस्व था। जिन क्षेत्रों में एससी, एसटी और ओबीसी आबादी में वृद्धि हुई है, वहां नए वर्गों के प्रतिनिधियों को चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा। वहीं, पहले से आरक्षित रही कुछ सीटों पर अब सामान्य वर्ग और महिलाओं की दावेदारी भी मजबूत होगी।

​डेटा की मांग और चुनाव प्रक्रिया

  • ​डेटा की उपलब्धता: 2011 की जनगणना में पिछड़े वर्ग के आंकड़े स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं थे, जिससे पंचायतों के मुख्यालय तय करने और उनके नामकरण में परेशानियां आ रही थीं। इसे दूर करने के लिए संयुक्त निर्वाचन आयुक्त शंभू कुमार ने सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव को पत्र लिखकर 2022-23 के जाति सर्वे का डेटा उपलब्ध कराने की मांग की है।
  • ​मल्टी पोस्ट ईवीएम का उपयोग: वर्तमान पंचायती राज का कार्यकाल इसी साल नवंबर-दिसंबर में समाप्त हो रहा है और अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव ‘मल्टी पोस्ट ईवीएम’ के माध्यम से कराए जाएंगे।
  • ​त्रुटिरहित परिसीमन: चुनाव विशेषज्ञों के अनुसार, पिछड़ों की प्रमाणित जनसंख्या के बिना परिसीमन और आरक्षण की प्रक्रिया विवादित हो सकती है। सही आंकड़ों के मिलने से परिसीमन त्रुटिरहित होगा और चुनाव समय पर संपन्न हो सकेंगे।