पटना। बिहार की राजनीति में इन दिनों नाम बदलने का दौर तेजी से चल रहा है। जनता दल यूनाइटेड (JDU) का नाम बदलकर ‘जनता दल नीतीश’ (JDN) करने की मांग ने सूबे की सियासत में नया भूचाल ला दिया है। इस प्रस्ताव पर जेडीयू के भीतर और बाहर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, वहीं शहरों के नामकरण को लेकर भी घमासान मचा हुआ है।
जेडीयू के नाम पर आंतरिक हलचल और नेताओं की प्रतिक्रिया
जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने पार्टी के नाम से ‘यूनाइटेड’ शब्द हटाकर इसे जनता दल नीतीश (JDN) करने का सुझाव दिया। पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्री श्रवण कुमार ने इस बयान का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि नीतीश कुमार पार्टी के सर्वमान्य और सबसे बड़े नेता हैं। दूसरी ओर, उपमुख्यमंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने इसे व्यक्तिगत इच्छा बताते हुए स्पष्ट किया कि इस पर कोई भी अंतिम फैसला पार्टी के औपचारिक मंच पर ही लिया जाएगा।
बख्तियारपुर का नाम बदलने की मांग और विपक्ष का तंज
सत्ताधारी गठबंधन के कई नेताओं ने नीतीश कुमार के गृह शहर बख्तियारपुर का नाम बदलकर ‘नीतीशपुर’ या ‘नीतीशपुरम’ करने की मांग का समर्थन किया है। ‘हम’ पार्टी के अध्यक्ष संतोष कुमार सुमन और बीजेपी नेता संजय सरावगी ने भी आक्रमक तेवरों के साथ इस ऐतिहासिक शहर का नाम बदलने की वकालत की है।
इस बीच, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने इस पूरी कवायद पर तीखा तंज कसा है। आरजेडी नेताओं भाई वीरेंद्र और शक्ति यादव ने कटाक्ष करते हुए कहा कि यदि इसी तरह नेताओं के नाम पर दलों और शहरों के नाम रखे जाएंगे, तो फिर देश का नाम बदलकर ‘मोदीपुरम’ कर देना चाहिए। उन्होंने इसे चापलूसी की पराकाष्ठा करार दिया है। इसके अलावा, एलजेपीआर ने जेपी गंगा पथ (मरीन ड्राइव) के गोलंबर का नाम रामविलास पासवान के नाम पर रखने की मांग उठाई है।
शहर का नाम बदलने की लंबी और खर्चीली प्रक्रिया
किसी भी शहर या स्थान का नाम बदलना रातों-रात संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए एक जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है:
- प्रस्ताव और विधानसभा मंजूरी: सबसे पहले स्थानीय जनप्रतिनिधियों या राज्य सरकार के स्तर पर प्रस्ताव तैयार होता है, जिसे विधानसभा में बहुमत से पास कराना अनिवार्य है।
- केंद्रीय विभागों की हरी झंडी: विधानसभा से पारित होने के बाद प्रस्ताव केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के पास भेजा जाता है। गृह मंत्रालय की एनओसी (NOC) मिलने के बाद रेल मंत्रालय, डाक विभाग, इंटेलिजेंस ब्यूरो और सर्वे ऑफ इंडिया से अनुमति ली जाती है।
- अधिसूचना: सभी विभागों की मंजूरी मिलने के बाद केंद्र और राज्य सरकार मिलकर आधिकारिक गजट अधिसूचना जारी करती हैं।
यह पूरी प्रक्रिया प्रशासनिक और आर्थिक रूप से काफी महंगी साबित होती है। उदाहरण के लिए, साल 2018 में इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज करने में लगभग 300 करोड़ रुपए का भारी-भरकम खर्च आया था। मौजूदा समय में बिहार में किसी बड़े शहर का नाम बदलने पर भी इसी के आसपास सरकारी खर्च आने का अनुमान है।



