पटना। बिहार में प्रस्तावित ‘सैटेलाइट टाउनशिप’ परियोजना के तहत कृषि योग्य उपजाऊ भूमि का जबरन अधिग्रहण इन दिनों एक गंभीर राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन गया है। राजद नेत्री रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया के माध्यम से इस नीति पर तीखा प्रहार करते हुए इसे किसान विरोधी बताया है। उनका आरोप है कि सम्राट सरकार के प्रशासनिक दबाव और मनमाने तरीकों से बहु-फसली जमीन छीनी जा रही है, जिससे किसानों के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

​खाद्य सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव

​बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य में उपजाऊ और बहु-फसली जमीनों का इस तरह अधिग्रहण सीधे तौर पर राज्य की खाद्य सुरक्षा को खतरे में डालता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है। जब किसानों से उनकी पीढ़ियों पुरानी उपजाऊ जमीन छीन ली जाती है, तो उनकी ग्रामीण आजीविका का एकमात्र साधन भी समाप्त हो जाता है। छोटे और सीमांत किसानों के पास आय का अन्य कोई दूसरा साधन नहीं होता है, जिसके कारण उन्हें अपनी पुश्तैनी आजीविका खोकर अंततः दिहाड़ी मजदूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

​रियल एस्टेट हित और पर्यावरणीय चिंताएं

​इस पूरी योजना के पीछे आम जनता और किसानों के कल्याण की बजाय रियल एस्टेट बिल्डरों तथा निजी कंपनियों को सीधा लाभ पहुंचाने का स्पष्ट उद्देश्य नजर आता है। उपजाऊ कृषि भूमि पर कंक्रीट के जंगल खड़े करने और हरे-भरे क्षेत्रों को नष्ट करने से भविष्य में गंभीर पर्यावरणीय संकट पैदा होना तय है। इससे भू-जल स्तर में भारी गिरावट आएगी और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी।

​कानूनी प्रावधानों की अनदेखी और जन प्रतिनिधियों की चुप्पी

​भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन यानी एसआईए और किसानों की पूर्व सहमति प्राप्त करने जैसे अनिवार्य कानूनी प्रावधानों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। प्रशासनिक तंत्र के बल पर किसानों को डरा-धमकाकर जमीन हथियाने का खेल चल रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस गंभीर अन्याय पर तमाम सांसदों और विधायकों की चुप्पी बनी हुई है। जनप्रतिनिधियों का किसानों के पक्ष में न खड़ा होना इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करता है कि सत्ताधारी खेमे और पूंजीपति कॉर्पोरेट घरानों की मिलीभगत से किसानों को योजनाबद्ध तरीके से संकट में धकेला जा रहा है।

​वैकल्पिक समाधान और निष्कर्ष

​किसानों को उनकी अपनी ही जमीन से बेदखल करना किसी भी विकास की श्रेणी में नहीं आता, बल्कि यह विनाश की एक सुनियोजित पहल है। सरकार को चाहिए कि उपजाऊ जमीनों को अधिग्रहित करने के बजाय बंजर और अनुपजाऊ भूमि पर टाउनशिप विकसित करे, जिससे विकास कार्यों के साथ-साथ किसानों के मौलिक अधिकारों और उनकी आजीविका की पुख्ता सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके।