रायपुर। छत्तीसगढ़ में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के क्रियान्वयन को लेकर भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने गंभीर सवाल उठाए हैं। सीएजी की प्रदर्शन लेखा परीक्षा (परफॉर्मेंस ऑडिट) रिपोर्ट में योजना निर्माण, वित्तीय प्रबंधन, रोजगार उपलब्ध कराने, निगरानी व्यवस्था और सामाजिक अंकेक्षण से जुड़े कई स्तरों पर कमियां सामने आई हैं। मार्च 2024 को समाप्त अवधि के लिए तैयार की गई यह रिपोर्ट मंगलवार को छत्तीसगढ़ विधानसभा के पटल पर रखी गई। रिपोर्ट में मनरेगा के क्रियान्वयन की समीक्षा करते हुए सीएजी ने बताया कि योजना के उद्देश्य के अनुरूप काम करने में कई जगहों पर व्यवस्थागत खामियां देखने को मिलीं।

रिपोर्ट के अनुसार योजना में निर्धारित सहभागी योजना निर्माण प्रक्रिया का प्रभावी रूप से पालन नहीं किया गया। श्रम बजट तैयार करने से पूर्व आवश्यक गृह सर्वेक्षण नहीं कराए गए तथा अनेक विकास कार्यों को ग्राम सभाओं की अनिवार्य स्वीकृति के बिना ही शुरू कर दिया गया। लेखा परीक्षा के दौरान परीक्षण की गई 48 ग्राम पंचायतों में लगभग 86 प्रतिशत कार्य ग्राम सभा की स्वीकृति के बिना कराए गए।

लेखा परीक्षा में यह भी पाया गया कि 21 प्रतिशत मानव संसाधनों की कमी, विशेषकर तकनीकी सहायकों एवं ग्राम रोजगार सहायकों के रिक्त पदों के कारण योजना का प्रभावी क्रियान्वयन प्रभावित हुआ। तकनीकी प्रकोष्ठ जैसी संस्थागत व्यवस्थाएं अपेक्षित स्तर पर विकसित नहीं हो सकीं, जबकि प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रमों में निर्धारित लक्ष्य की तुलना में 97 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

वित्तीय प्रबंधन की समीक्षा में निधियों के उपयोग में अनियमितताएं, पर्याप्त राशि उपलब्ध होने के बावजूद मजदूरी भुगतान में विलंब तथा कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) अंशदान के भुगतान में गंभीर त्रुटियां सामने आईं। अप्रैल 2015 से मार्च 2023 की अवधि के दौरान 29.62 करोड़ रुपये का कर्मचारी भविष्य निधि अंशदान जमा नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप ब्याज एवं जुर्माने सहित देनदारियां बढ़कर 84.59 करोड़ रुपये हो गईं।

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रिपोर्ट में बताया गया है कि योजना में महिलाओं की भागीदारी 43 से 59 प्रतिशत के बीच रही, जो निर्धारित न्यूनतम 33 प्रतिशत से अधिक है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदाय की भागीदारी भी उनकी जनसंख्या के अनुपात के अनुरूप पाई गई। हालांकि, रोजगार उपलब्ध कराने के मामले में 134.10 लाख परिवारों को रोजगार दिया गया, जिनमें से 111.31 लाख परिवारों (83 प्रतिशत) को 100 दिनों से कम रोजगार मिला, जबकि केवल 1.23 लाख परिवारों (0.92 प्रतिशत) को निर्धारित 100 दिनों का रोजगार प्राप्त हुआ। वहीं 21.56 लाख परिवारों (16 प्रतिशत) को 100 दिनों से अधिक रोजगार उपलब्ध कराया गया।

लेखा परीक्षा के अनुसार वर्ष 2019-20 से 2023-24 के दौरान 152.36 लाख परिवारों ने रोजगार की मांग की, जबकि 134.10 लाख परिवारों को ही रोजगार उपलब्ध कराया गया। इस प्रकार 18.26 लाख परिवारों (लगभग 12 प्रतिशत) को रोजगार उपलब्ध नहीं कराया जा सका। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि पात्र परिवारों को इस स्थिति में भी बेरोजगारी भत्ते का भुगतान नहीं किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019-20 से 2023-24 के दौरान स्वीकृत कार्यों में से अक्टूबर 2024 तक केवल 61 प्रतिशत कार्य ही पूर्ण हो सके। संयुक्त भौतिक सत्यापन के दौरान कई परिसंपत्तियां अनुपयोगी, गैर-कार्यशील अथवा निष्प्रयोज्य पाई गईं। इसके अलावा अभिसरण (कन्वर्जेंस) के अंतर्गत कई कार्य पूर्व योजना एवं ग्राम सभा की स्वीकृति के बिना ही कराए गए। आकांक्षी विकासखंडों में संचालित क्लस्टर फैसिलिटेशन प्रोजेक्ट भी विलंब से शुरू हुआ तथा विशेषज्ञों की कमी और निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति न होने जैसी समस्याओं से प्रभावित रहा।

निगरानी व्यवस्था की समीक्षा में पाया गया कि वैधानिक निकायों, जिनमें छत्तीसगढ़ ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषद तथा राज्य स्तरीय सशक्त समिति शामिल हैं, की अनिवार्य बैठकें आयोजित नहीं की गईं। जिला गुणवत्ता निगरानी प्रकोष्ठ गठित नहीं किए गए तथा ग्राम पंचायत स्तर पर रखे जाने वाले कई अनिवार्य अभिलेख या तो अधूरे पाए गए अथवा उनका संधारण ही नहीं किया गया।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 के अंतर्गत जवाबदेही सुनिश्चित करने के महत्वपूर्ण माध्यम सामाजिक अंकेक्षण का संचालन निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं किया गया। सामाजिक अंकेक्षण के लिए निर्धारित 58.68 करोड़ रुपये में से केवल 42.55 करोड़ रुपये ही व्यय किए गए। सामाजिक अंकेक्षण इकाई में स्वीकृत पदों के लगभग 45 प्रतिशत पद रिक्त रहे, जबकि कुछ वर्षों में 99.97 प्रतिशत तक ग्राम पंचायतों का सामाजिक अंकेक्षण नहीं हो सका। इसके अलावा सामाजिक अंकेक्षण में दर्ज 53 प्रतिशत से अधिक आपत्तियों का निराकरण भी लंबित पाया गया। रिपोर्ट में योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए योजना निर्माण प्रक्रिया, वित्तीय प्रबंधन, संस्थागत क्षमता, निगरानी तंत्र तथा जवाबदेही व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने संबंधी अनेक सिफारिशें भी की गई हैं।

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