अमित पाण्डेय, खैरागढ़। किसानों को बेहतर सिंचाई देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई लमानिन बांध (जुरलाकला-उदरीनवागांव) से देवारीभाठ तक की नहर की हकीकत दूसरी ही बारिश में सामने आ गई। जिस नहर को वर्षों तक टिकाऊ बताकर बनाया गया था, उसकी कंक्रीट जगह-जगह से उखड़ गई है। कई हिस्सों में नीचे बिछाई गई काली पॉलीथिन तक बाहर दिखाई दे रही है। नहर किनारे किसानों के लिए बनाए गए रास्ते भी पहली बारिश में बह गए। अब ग्रामीण सवाल पूछ रहे हैं कि अगर करोड़ों की नहर दो बारिश भी नहीं झेल पाई, तो आखिर पैसा गया कहां? नहर के कई हिस्सों में कंक्रीट टूटी और उखड़ी मिली।

ग्रामीणों ने लगाए गंभीर आरोप
ग्रामीणों का कहना है कि पिछले साल भी नुकसान हुआ था, लेकिन तब सिर्फ ऊपर-ऊपर मरम्मत कर मामला दबा दिया गया। इस बार बारिश ने सारी हकीकत सामने ला दी। जहां मजबूत कंक्रीट होनी चाहिए थी, वहां अब पॉलीथिन नजर आ रही है। लोगों का कहना है कि यह नहर कम और निर्माण की गुणवत्ता का नमूना ज्यादा लग रही है। सबसे ज्यादा परेशानी किसानों को हो रही है। दपका के पास अमलही से भरकनहा खार जाने वाला रास्ता कट गया है। करीब 200 एकड़ खेतों तक पहुंचना मुश्किल हो गया है। ट्रैक्टर और कृषि मशीनें अब सीधे खेत तक नहीं पहुंच पा रहीं। कई किसानों को मजबूरी में बैलों से खेती करनी पड़ रही है।

ग्रामीणों का आरोप है कि नहर किनारे बनने वाले रास्तों पर मुरूम डालने का प्रावधान था, लेकिन ज्यादातर जगहों पर मुरूम डाला ही नहीं गया। कुछ जगह सड़क के पास काम दिखाकर बाकी हिस्सों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया। बारिश शुरू होते ही रास्ते कीचड़ में बदल गए और किसानों की परेशानी कई गुना बढ़ गई। अब सवाल सिर्फ उखड़ी हुई कंक्रीट का नहीं है, बल्कि पूरे निर्माण की गुणवत्ता का है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी अगर नहर दो साल में ही टूटने लगे, रास्ते बह जाएं और पॉलीथिन बाहर आ जाए, तो यह किसी सामान्य खराबी से ज्यादा गंभीर मामला है।

जांच और कार्रवाई की मांग
ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण के समय गुणवत्ता से समझौता किया गया और अधिकारियों की निगरानी भी सिर्फ कागजों तक सीमित रही। ग्रामीण पूरे मामले की उच्चस्तरीय तकनीकी जांच और जिम्मेदार अधिकारियों व ठेकेदार पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर अभी जांच नहीं हुई तो हर बारिश के बाद करोड़ों रुपये की यह नहर इसी तरह टूटती रहेगी और उसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ेगा।

जल संसाधन विभाग के सब इंजीनियर ने क्या कहा ?
इस मामले में जल संसाधन विभाग के सब इंजीनियर शुभम चंद्राकर का कहना है कि नहर निर्माण उनके कार्यकाल से पहले हुआ था। निरीक्षण में कुछ स्थानों पर बारिश से मिट्टी का कटाव और गाद जमा होने की जानकारी मिली है। साफ-सफाई के निर्देश दिए गए हैं और जहां रास्ता कटा है वहां अतिरिक्त जल निकासी की व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव वरिष्ठ अधिकारियों को भेजा गया है। निर्माण की गुणवत्ता की जांच और आगे की कार्रवाई का निर्णय वरिष्ठ अधिकारी करेंगे। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है, जब करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई नहर दो बारिश भी नहीं झेल सकी, तो क्या जल संसाधन विभाग की जिम्मेदारी सिर्फ टेंडर जारी करने और भुगतान करने तक ही सीमित है, या फिर निर्माण की गुणवत्ता की जवाबदेही भी कोई तय करेगा?
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