सुप्रिया पांडे, रायपुर। आज के दौर में जहां लाखों लोगों का डेटा एक छोटे से टैबलेट या कंप्यूटर में पलक झपकते ही सुरक्षित हो जाता है, वहीं आज से करीब 95 साल पहले भारत की आबादी गिनना किसी खतरनाक और साहसिक अभियान जैसा था। बिना इंटरनेट और बिना किसी आधुनिक तकनीक के साल 1931 में करोड़ों लोगों का रिकॉर्ड न केवल हाथ से तैयार किया गया, बल्कि इसके लिए कर्मचारियों को अपनी जान भी जोखिम में डालनी पड़ी थी।

जब जनगणना अधिकारी पर हुआ बाघ का हमला

1931 की जनगणना का सबसे रोमांचक और हैरान कर देने वाला वाकया तत्कालीन बस्तर रियासत में घटा। बस्तर क्षेत्र का निरीक्षण कर रहे तत्कालीन प्रशासक डब्ल्यू. वी. ग्रिग्सन की गाड़ी पर एक आदमखोर बाघ ने हमला कर दिया था। हालांकि, इस हमले में ग्रिग्सन सुरक्षित बच गए, लेकिन यह घटना इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई और यह साबित करती है कि उस दौर में जनगणना करना सिर्फ कागजी काम नहीं, बल्कि जंगलों और वन्यजीवों के बीच एक खतरनाक जंग जैसा था।

किसी सैन्य अभियान जैसी थीं तैयारियां

1931 की जनगणना की तैयारियां कई महीने पहले, यानी 31 जुलाई 1930 को ही ब्रिटिश सरकार के गृह विभाग द्वारा जारी विस्तृत दिशा-निर्देशों के साथ शुरू हो गई थीं। इसका उद्देश्य सिर्फ सिर गिनना नहीं, बल्कि भारतीय समाज के ताने-बाने को समझना था।

इस दौरान मुख्य रूप से ये आंकड़े जुटाए गए:

  • गांवों, कस्बों और मकानों की कुल संख्या।
  • मातृभाषा, साक्षरता दर और भाषाई विविधता।
  • धर्म, जाति, जनजातियां और उनकी सामाजिक स्थिति।
  • वैवाहिक स्थिति, आयु वर्ग और बेरोजगारी के आंकड़े।
  • कृषि, मजदूरी, व्यापार और हस्तशिल्प जैसे व्यवसाय।

बैलगाड़ी, घोड़े और पैदल सफर का वो दौर

उस दौर में देश के कई हिस्से सड़क और संचार सुविधाओं से पूरी तरह कटे हुए थे। गणनाकर्मी घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ियों को पार करते हुए बैलगाड़ियों, घोड़ों और पैदल ही दूरस्थ गांवों तक पहुंचते थे। कई जगह तो कर्मचारियों को जनता के विरोध का भी सामना करना पड़ा; लोग मकानों पर नंबर लिखे जाने से डरते थे कि सरकार कहीं कोई नया टैक्स न लगा दे।

‘सीपी एंड बरार’ और आज का छत्तीसगढ़

1931 में आज का छत्तीसगढ़ एक अलग राज्य नहीं था। यह तत्कालीन सीपी एंड बरार का हिस्सा था, जो ब्रिटिश भारत का एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रांत था। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, बस्तर और रायगढ़ जैसे क्षेत्र इसी के अंतर्गत आते थे।

1931 की इस रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ को एक विशिष्ट सांस्कृतिक और जनजातीय क्षेत्र के रूप में दर्ज किया गया था। बस्तर, कांकेर, सरगुजा और जशपुर की जनजातीय आबादी, उनकी परंपराओं और वनोपज आधारित अर्थव्यवस्था को पहली बार इतने व्यवस्थित तरीके से दुनिया के सामने लाया गया था।

आज भी क्यों खास है यह दस्तावेज?

इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों के लिए 1931 की जनगणना आज भी एक अमूल्य धरोहर है। सामाजिक और जातीय संरचना पर होने वाले शोध आज भी इन्हीं आंकड़ों का संदर्भ लेते हैं। आज जब हम इतिहास के इन पीले पड़ चुके पन्नों को पलटते हैं, तो अहसास होता है कि यह सिर्फ इंसानों की गिनती नहीं, बल्कि उस दौर के भारत को कागज पर जीवंत करने का एक विराट और ऐतिहासिक प्रयास था। करोड़ों लोगों के जीवन, भाषाओं, परंपराओं, व्यवसायों और सामाजिक संरचना को कागज पर उतारने वाली यह जनगणना आज भी भारत और छत्तीसगढ़ के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजी विरासतों में से एक मानी जाती है।

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