रोहित कश्यप, मुंगेली। अस्पताल निर्माण को लेकर जिले के जरहागांव नगर पंचायत और ग्राम पंचायत छतौना के बीच चल रहा विवाद अब सिर्फ स्थानीय बहस नहीं रहा, यह प्रशासनिक प्राथमिकता और जनहित का बड़ा मुद्दा बन चुका है। इस पूरे घटनाक्रम में एक अहम मोड़ तब आया, जब इस विषय को lalluram.com ने प्रमुखता से उठाया। लगातार उठते सवाल, जमीनी हकीकत और कथित जनप्रतिनिधियों में “अंदरखाने सेटिंग” जैसी चर्चाओं को सामने लाने के बाद अब प्रशासन हरकत में आया है।

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खबर का दिखा असर

कलेक्टर कुंदन कुमार ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए न केवल संज्ञान लिया, बल्कि स्पष्ट दिशा-निर्देश भी जारी कर दिए हैं। इससे यह संकेत मिल रहा है कि अब यह मामला लंबित फाइलों से निकलकर निर्णायक प्रक्रिया में प्रवेश कर चुका है।

विवाद की जड़: जमीन, सुविधा या सियासत?

पूरा मामला एक प्रस्तावित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) के निर्माण से जुड़ा है, जो नगर पंचायत जरहागांव और ग्राम पंचायत छतौना के बीच प्रस्तावित है। करीब 6 माह पहले छतौना की गौठान भूमि पर निर्माण का प्रस्ताव जिला पंचायत में पारित हुआ। स्वास्थ्य विभाग ने भूमि आवंटन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई, राजस्व विभाग स्तर पर जांच भी शुरू हुई, लेकिन जैसे ही यह प्रस्ताव सार्वजनिक हुआ, जरहागांव के लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया।

दोनों पक्षों के तर्क—अपनी-अपनी मजबूती

छतौना का पक्ष

मुख्य मार्ग से लगा हुआ उपलब्ध भूमि और विस्तार की संभावना, मुख्य मार्ग से कनेक्टिविटी, पहले से थाना, समिति और धान खरीदी केंद्र की मौजूदगी, भौगोलिक रूप से पास, केवल एक पुल का अंतर।

जरहागांव का पक्ष

वर्तमान में अस्पताल नगर क्षेत्र में संचालित, पहले से बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध, लोगों की पहुंच और आदतें उसी स्थान से जुड़ी, यथास्थान निर्माण से सेवा की निरंतरता। दोनों ही पक्ष अपने-अपने तर्कों में कहीं न कहीं सही नजर आते हैं। यही वजह है कि मामला उलझता चला गया।

राजनीतिक एंगल: ज्ञापन और चुप्पी की रणनीति

मामले में कांग्रेस नेताओं की एंट्री ने इसे और हवा दी। कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर स्थल चयन पर पुनर्विचार की मांग की गई। कांग्रेसी नेता रामचंद्र साहू ने तर्क दिया कि उनकी सरकार में प्राथमिक से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के रूप में उन्नयन हुआ, इसलिए नगरीय क्षेत्र में ही बने, ऐसी मांग की। दूसरी ओर भाजपा से जुड़े जनप्रतिनिधि खुलकर सामने नहीं आए, लेकिन स्थानीय स्तर पर उनकी सक्रियता बनी रही। इससे यह स्पष्ट हुआ कि मामला केवल विकास का नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन का भी बन चुका है।

कमीशनखोरी की चर्चाएं: सवाल ज्यादा, जवाब कम

विवाद के बीच सबसे ज्यादा चर्चा “कमीशन” और “हिस्सेदारी” को लेकर रही।स्थानीय लोगों ने कथित रूप से जनप्रतिनिधियों पर इस तरह के अपुष्ट आरोप भी लगाएl करोड़ों की लागत वाले निर्माण में अंदरखाने खींचतान की बातें,निर्माण से पहले ही हिस्सेदारी तय होने की चर्चाएं, अचानक बढ़ी सक्रियता को इसी नजरिए से जोड़कर देखा जाना।

हालांकि, इन आरोपों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन देरी और असमंजस ने संदेह जरूर पैदा किया है।

खबर के बाद प्रशासन एक्टिव: कलेक्टर का बड़ा बयान

लगातार उठते सवालों और lalluram.com में प्रमुखता से प्रसारित खबर के बाद कलेक्टर कुन्दन कुमार ने स्पष्ट रूप से इस पूरे मामले को अपने संज्ञान में लिया।

उनका सबसे अहम बयान

जिले में बिलासपुर-मुंगेली मुख्य मार्ग पर एक भी CHC स्तर का अस्पताल नहीं है, इसलिए प्राथमिकता मुख्य सड़क से जुड़े स्थान को दी जाएगी। जरहागांव और छतौना दोनों पास-पास हैं, इसलिए नाम नहीं, लोकेशन महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जरहागांव में बने या छतौना में बने, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि अस्पताल वहां बने, जहां से अधिकतम लोगों को लाभ मिले और जमीन मुख्य मार्ग से सीधे तौर पर लगी हो। उन्होंने CMHO को निर्देशित किया है कि प्रैक्टिकल दृष्टिकोण से रिपोर्ट तैयार कर अनुमोदन के लिए प्रस्तुत की जाए। जिसके बाद स्वास्थ्य विभाग की टीम ने दोनों ही जगहों के अलग-अलग लोकेशन का निरीक्षण किया है, जिसका प्रतिवेदन कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत होगा और उनके अनुमोदन के बाद ही अंतिम निर्णय हो सकेगा।

अब क्या बदलेगा?

कलेक्टर के इस रुख से कई चीजें साफ हो रही हैं। विवाद को नगर बनाम गांव से हटाकर सुविधा बनाम पहुंच पर लाया जा रहा है, तकनीकी मूल्यांकन को प्राथमिकता दी जाएगी, निर्णय प्रक्रिया को तेज और संतुलित बनाया जाएगा।

पारदर्शिता ही बनेगी समाधान

इस पूरे विवाद ने एक बात साफ कर दी है कि अगर शुरुआत से ही प्रक्रिया पारदर्शी होती, तो शायद यह स्थिति नहीं बनती। अब जरूरी है कि स्थल चयन के मानदंड सार्वजनिक हों, निर्माण लागत और टेंडर प्रक्रिया खुली हो, समयबद्ध तरीके से काम शुरू हो।

जनहित सबसे ऊपर : यही है असली कसौटी

यह अस्पताल केवल एक गांव या नगर के लिए नहीं, बल्कि लगभग दो दर्जन गांव के लोगों के लिए प्रस्तावित है। इसलिए निर्णय किसी एक पक्ष की जीत नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की जरूरत के आधार पर होना चाहिए।

अब फैसला भावनाओं से नहीं, तथ्यों से होगा

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि जब मुद्दा जनहित से जुड़ा हो, तो उसे उठाने का असर जरूर होता है। खबर के बाद प्रशासन की सक्रियता और कलेक्टर का स्पष्ट रुख इस बात का संकेत है कि अब समाधान दूर नहीं। यहां यह बताना भी लाजमी होगा कि हमने खबर में नगर में बने या गांव में बने इससे ऊपर उठकर जो विभिन्न पहलुओं पर उचित हो ऐसे स्थान पर बने, इस पर फोकस किया गया था और विवाद के पटाक्षेप के लिए कलेक्टर को संज्ञान में लिया जाना चाहिए, ऐसी बातों का जिक्र भी खबर में थी।