दिल्ली आबकारी नीति मामले में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। दिल्ली हाई कोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने इस केस की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अवमानना मामले की सुनवाई वही करेंगी। इस फैसले के बाद दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक Arvind Kejriwal ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “सत्य की जीत हुई है। गांधी जी के सत्याग्रह की एक बार फिर विजय हुई है।” अब इस मामले की अगली सुनवाई अब नई बेंच के समक्ष होने की संभावना है।

अवमानना कार्रवाई का ऐलान

गौरतलब है कि, खुद को इस केस से अलग करने से पहले स्वर्ण कांता शर्मा ने मामले से जुड़े कुछ प्रतिवादियों के खिलाफ आज अवमानना कार्रवाई शुरू करने की बात कही थी। अदालत में सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि कुछ पक्षों द्वारा उनके खिलाफ अत्यंत मानहानिकारक और दुर्भावनापूर्ण सामग्री सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका और न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ इस तरह की टिप्पणियों को किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस प्रकार की पोस्ट न केवल व्यक्तिगत स्तर पर आपत्तिजनक हैं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा को भी प्रभावित करती हैं।

‘अदालत आलोचना से नहीं डरती’

सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने साफ कहा कि अदालत किसी से सहानुभूति या प्रशंसा की अपेक्षा नहीं रखती। उन्होंने कहा कि न्यायिक आदेशों की निष्पक्ष आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जब आलोचना न्यायपालिका की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाने लगे, तब अदालत को कार्रवाई करनी पड़ती है।

उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर अदालत को बदनाम करने की कोशिश की जाएगी तो कानून के तहत उपलब्ध अधिकारों का इस्तेमाल किया जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह स्वतंत्र अभिव्यक्ति की विरोधी नहीं है, लेकिन ‘फेयर क्रिटिसिज्म’ और ‘कंटेम्प्ट’ के बीच बहुत पतली रेखा होती है।

‘मेरा चुप रहना कर्तव्य से पीछे हटना होता’

जस्टिस शर्मा ने कहा कि इस पूरे मामले पर चुप रहना उनके लिए आसान हो सकता था, लेकिन ऐसा करना उनके न्यायिक कर्तव्य से पीछे हटने जैसा होता। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका पर संगठित तरीके से सवाल उठाने की कोशिशों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

निष्पक्षता बनाए रखने के लिए लिया फैसला

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि अवमानना का नोटिस केवल वही जारी कर सकती थीं, क्योंकि टिप्पणियां सीधे उनके खिलाफ थीं। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि यदि वे आगे भी इस मामले की सुनवाई करतीं, तो संबंधित पक्ष यह महसूस कर सकते थे कि उनके मन में किसी प्रकार की रंजिश है।

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