दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने राजधानी में स्थित जिमखाना क्लब (Gymkhana Club), इंडियन पोलो क्लब(Indian Polo Club) और दिल्ली रेस क्लब(Delhi Race Club) की जमीन को अपने कब्जे में लेने की केंद्र सरकार की प्रस्तावित योजना पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि दिल्ली पहले से ही गंभीर प्रदूषण और हरित क्षेत्र की कमी से जूझ रही है, ऐसे में बची हुई हरियाली को भी सरकारी नियंत्रण में लेने की कोशिश चिंताजनक है। मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस नीना बंसल कृष्णा (Neena Bansal Krishna) की पीठ ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि जब राजधानी में पर्यावरणीय चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं, तब खुले और हरित क्षेत्रों के संरक्षण को प्राथमिकता क्यों नहीं दी जा रही है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि दिल्ली का दम प्रदूषण के कारण पहले ही घुट रहा है और शहर में हरित क्षेत्र लगातार कम होते जा रहे हैं। ऐसे में जो हरियाली बची हुई है, उसे भी अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की जा रही है।
कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा, “आपको पोलो क्लब की जमीन क्यों चाहिए? जिमखाना क्लब को लेकर आपका क्या प्लान है? क्या वहां आप 20 मंजिला इमारत बनाना चाहते हैं?” अदालत ने कहा कि यदि ऐसे खुले और हरित क्षेत्रों का स्वरूप बदलता है तो इसका सीधा असर दिल्ली के पर्यावरण और लोगों के जीवन पर पड़ेगा। सुनवाई के दौरान अदालत ने दिल्ली की वायु गुणवत्ता और हरित क्षेत्रों में कमी पर गंभीर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा, “इस कदम से दिल्ली का दम घुट जाएगा। NDMC क्षेत्र में जो थोड़ी राहत मिली हुई है, वह भी खत्म हो जाएगी। हम घुटकर मर जाएंगे।”
पीठ ने आगे टिप्पणी करते हुए कहा कि राजधानी के लोगों को पहले ही प्रदूषण की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है। “आप ही जानते हैं कि आप दिल्ली को क्या बनाना चाहते हैं। आप दिल्ली के लोगों से कह रहे हैं कि छोटे-मोटे पहाड़ों पर चले जाइए और दिल्ली रहने लायक नहीं रहेगी। आपको बिल्कुल अंदाजा नहीं है कि हमारा कितना दम घुट रहा है। हमारे पास जो भी थोड़ी-बहुत जान बची है, उसे भी आप छीनने जा रहे हैं।”
पोलो एसोसिएशन ने दाखिल की थी याचिका
भारतीय पोलो एसोसिएशन(Indian Polo Association) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट में केंद्र सरकार ने संबंधित भूमि को सार्वजनिक और रक्षा उद्देश्यों के लिए आवश्यक बताया। भारतीय पोलो एसोसिएशन ने 20 मई 2026 को जारी बेदखली नोटिस को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश स्थायी वकील आशीष दीक्षित ने अदालत को बताया कि संबंधित भूमि का उपयोग सार्वजनिक हित और रक्षा प्रतिष्ठानों से जुड़े कार्यों के लिए किया जाना है। उन्होंने यह भी दलील दी कि मध्य दिल्ली में उपलब्ध भूमि अत्यंत सीमित है और कई महत्वपूर्ण सरकारी गतिविधियों तथा संस्थानों का संचालन इसी क्षेत्र से किया जाना आवश्यक है।
ऊंची इमारतें बनाना जनहित में कैसे?
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र सरकार की दलीलों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए सवाल उठाया कि संबंधित भूमि पर ऊंची इमारतों का निर्माण किस प्रकार जनहित में माना जा सकता है। अदालत ने कहा कि दिल्ली पहले से ही अत्यधिक निर्माण और घनी आबादी के दबाव का सामना कर रही है। कोर्ट ने टिप्पणी की, “दिल्ली की तरफ देखिए। हर जगह ऊंची इमारतें हैं। अगर आप दिल्ली को ऐसे ही रखना चाहते हैं तो भगवान ही हमें बचाए। आपके पास ताकत है, आप जो चाहें करें, लेकिन सच यही है कि इससे दिल्ली का दम घुट जाएगा।”
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