दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने ट्रेन यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यदि कोई यात्री वैध टिकट लेकर ट्रेन में चढ़ता है, तो उसे सुरक्षित तरीके से अपनी सीट तक पहुंचाना रेलवे की जिम्मेदारी है। इसमें प्लेटफॉर्म और कोच के अंदर होने वाली भीड़, धक्का-मुक्की और अव्यवस्था को नियंत्रित करना भी शामिल है। पीठ ने सख्त लहजे में कहा कि रेलवे अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। अगर यात्रियों को असुविधा या खतरे का सामना करना पड़ता है, तो इसके लिए रेलवे को जवाबदेह ठहराया जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि रेलवे को अपनी कमियों को छिपाने के बजाय उन्हें स्वीकार करना चाहिए और व्यवस्था में सुधार के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
हाई कोर्ट ने ट्रेन यात्रियों की सुरक्षा को लेकर एक कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि भीड़ या धक्का-मुक्की के कारण यदि किसी यात्री को नुकसान होता है, तो उसके लिए रेलवे जिम्मेदार होगा और पीड़ितों या उनके परिवारों को हर हाल में मुआवजा देना पड़ेगा। जस्टिस मनेाज कुमार ओहरी की पीठ ने इस महीने ऐसे करीब सात मामलों में केंद्र सरकार को उचित मुआवजा देने के निर्देश दिए हैं। ये मामले ट्रेन के भीतर और रेलवे परिसर में भीड़भाड़ व अव्यवस्था के कारण हुए हादसों से जुड़े थे। अदालत ने साफ कहा कि रेलवे पर यह जिम्मेदारी है कि वह प्लेटफॉर्म से लेकर ट्रेन के अंदर तक भीड़ और धक्का-मुक्की को नियंत्रित करे। यदि इसमें चूक होती है, तो इसकी जवाबदेही भी रेलवे की ही होगी।
पीठ ने कहा कि जब कोई यात्री वैध टिकट लेकर ट्रेन में सफर करने का निर्णय लेता है, तो उसके मन में एक सुरक्षित और व्यवस्थित यात्रा की उम्मीद होती है। खासकर आरक्षित डिब्बों में सफर करने वाले यात्रियों को यह भरोसा रहता है कि उन्हें बिना परेशानी अपनी सीट तक पहुंचने और आराम से यात्रा करने का मौका मिलेगा। अदालत ने माना कि यदि ऐसी स्थिति में यात्री अपनी गलती के बजाय रेलवे की लापरवाही का शिकार होता है, तो इसका असर सिर्फ उस व्यक्ति या उसके परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे रेलवे की साख और विश्वसनीयता पर भी सीधा असर पड़ता है। पीठ ने यह भी दोहराया कि रेलवे को अपनी कमियों को छिपाने के बजाय उन्हें स्वीकार करना चाहिए और उनकी जिम्मेदारी लेते हुए सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए, ताकि भविष्य में यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित की जा सके।
2 महीने में मुआवजा देने के आदेश
पीठ ने सख्ती से कहा है कि मुआवजा तय करने से लेकर उसके भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया दो महीने के भीतर पूरी की जाए। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि अब और देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कोर्ट ने यह भी संवेदनशील टिप्पणी की कि इन पीड़ित परिवारों में से कई अपने प्रियजनों को हमेशा के लिए खो चुके हैं और मुआवजा पाने के लिए उन्हें लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी है। ऐसे में न्याय में और देरी करना उचित नहीं होगा।
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