दिल्ली में करोड़ों रुपये के कथित मेडिकल उपकरण और दवा खरीद घोटाले की जांच का दायरा बढ़ गया है। एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) अब स्वास्थ्य विभाग के6 अन्य कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच कर रही है। हालांकि, फिलहाल इन कर्मचारियों की संलिप्तता या जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं हो पाई है। जांच एजेंसी इन कर्मचारियों की भूमिका का पता लगाने के लिए मामले में गिरफ्तार 3 आरोपियों से पूछताछ कर रही है। इनमें पूर्व DGHS डॉ. वत्सला अग्रवाल, डिप्टी कंट्रोलर अकाउंट्स नीरज चोपड़ा और CPA के तत्कालीन प्रभारी डॉ. विनोद कुमार रंगा शामिल हैं। इसके अलावा एसीबी कुछ वेंडरों से भी पूछताछ कर रही है, ताकि खरीद प्रक्रिया, भुगतान और कथित अनियमितताओं से जुड़े तथ्यों को सामने लाया जा सके।
जांच के दायरे में आए स्वास्थ्य विभाग के 6 अन्य कर्मचारियों से जुड़े दस्तावेजों की भी समीक्षा की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इनकी भूमिका किस स्तर पर रही। एसीबी के अनुसार, सामने आ रहे दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर जल्द ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। एजेंसी का कहना है कि जांच अभी शुरुआती और महत्वपूर्ण चरण में है, इसलिए सभी पहलुओं को विस्तार से जांचा जा रहा है।
गौरतलब है कि इस मामले में सबसे पहले CPA के तत्कालीन प्रभारी डॉ. विनोद कुमार रंगा को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें अदालत ने चार दिन की पुलिस हिरासत में भेजा था, जहां रिमांड के दौरान उनसे पूछताछ कर कई अहम जानकारियां जुटाई गईं। इसके बाद जांच को आगे बढ़ाते हुए एसीबी ने पूर्व डीजीएचएस डॉ. वत्सला अग्रवाल और डिप्टी कंट्रोलर अकाउंट्स नीरज चोपड़ा को भी गिरफ्तार कर लिया। अब इन गिरफ्तारियों और पूछताछ के आधार पर पूरे खरीद प्रक्रिया की कड़ियों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
विजिलेंस रिपोर्ट के बाद शुरू हुई जांच
दिल्ली में कथित मेडिकल उपकरण और दवा खरीद घोटाले की जांच उस समय शुरू हुई जब विजिलेंस विभाग ने कुछ संदिग्ध लेन-देन और खरीद प्रक्रिया में नियमों के उल्लंघन को लेकर रिपोर्ट सौंपी थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर ACB ने पूरे मामले की विस्तृत जांच शुरू की। जांच एजेंसी ने शुरुआती चरण में ही खरीद प्रक्रिया से जुड़े सभी दस्तावेजों को खंगालना शुरू किया। इसमें टेंडर प्रक्रिया, तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन, ठेका आवंटन, आपूर्ति व्यवस्था, निरीक्षण, स्वीकृति और भुगतान से जुड़ी पूरी फाइलें शामिल हैं। एसीबी यह पता लगाने में जुटी है कि खरीद प्रक्रिया के किस स्तर पर अनियमितता हुई, किन लोगों को इसका फायदा पहुंचा और इस कथित घोटाले में और कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं। जांच के दौरान एजेंसी यह भी देख रही है कि क्या प्रक्रिया में किसी चरण पर जानबूझकर नियमों की अनदेखी की गई।
2 जून को दर्ज किया था मामला
नियमों के अनुसार ई-टेंडर प्रक्रिया सभी कंपनियों के लिए पूरी तरह खुली होनी चाहिए थी, ताकि प्रतिस्पर्धा के आधार पर कम कीमत पर दवाएं और उपकरण खरीदे जा सकें। हालांकि आरोप है कि कुछ अधिकारियों ने जानबूझकर टेंडर प्रक्रिया को इस तरह से तैयार किया कि उसमें चुनिंदा और कथित रूप से पसंदीदा सप्लायर्स को ही लाभ मिल सके। शिकायत में दावा किया गया है कि टेंडर की शर्तें इस तरह निर्धारित की गईं, जिससे कई योग्य कंपनियां प्रक्रिया से बाहर हो गईं और सीमित कंपनियों को ही ठेका मिला। इन्हीं आरोपों के आधार पर भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) ने 2 जून को मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और BNS की संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज की। इसके बाद से ही पूरे मामले की विस्तृत जांच जारी है।
करीब 650 करोड़ की अनियमितता के आरोप
दिल्ली में दवाइयों, सर्जिकल सामान और मेडिकल उपकरणों की खरीद से जुड़े कथित घोटाले में लगभग 650 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। यह पूरा मामला सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी (CPA) के माध्यम से हुई खरीद प्रक्रियाओं से जुड़ा बताया जा रहा है। सीपीए, डायरेक्टर जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज (DGHS) के अधीन कार्य करती है और स्वास्थ्य विभाग के लिए दवाइयों, मेडिकल उपकरणों तथा अन्य आवश्यक सामग्री की खरीद की जिम्मेदारी संभालती है। आरोप है कि इसी खरीद प्रणाली के दौरान नियमों की अनदेखी कर बड़ी वित्तीय गड़बड़ियां की गईं। एंटी करप्शन ब्रांच (एसीबी) इस मामले में वित्तीय लेन-देन, खरीद प्रक्रिया में अपनाई गई कार्यप्रणाली और उसमें शामिल अधिकारियों की भूमिका की विस्तार से जांच कर रही है। एजेंसी यह भी देख रही है कि खरीद के अलग-अलग चरणों में निर्णय लेने की प्रक्रिया में किन स्तरों पर अनियमितता हुई और क्या इसमें किसी संगठित पैटर्न के तहत नियमों का उल्लंघन किया गया।
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