विदेश भेजने के नाम पर कुरुक्षेत्र के युवक रोहित को डंकी रूट के जरिए फंसाया गया। बेलारूस में प्रताड़ना और 7 महीने जेल काटने के बाद वह वापस भारत लौटा है।
कुरुक्षेत्र। बेहतर भविष्य, मोटी कमाई और विदेश में नई जिंदगी का सपना… लेकिन कुछ महीनों में वही सपना ऐसा डरावना सच बन गया, जिसने एक परिवार की जमा-पूंजी निगल ली और बेटे को हजारों किलोमीटर दूर भूख, मारपीट और जेल की सलाखों तक पहुंचा दिया।
घरवालों को लगा था कि बेटा यूरोप पहुंचकर जिंदगी संवार लेगा, लेकिन एक दिन वीडियो कॉल पर जो तस्वीर सामने आई, उसने परिवार के पैरों तले जमीन खिसका दी। बेटा तंबू में ठंड से कांप रहा था, पैसे खत्म हो चुके थे और जान बचाने की गुहार लगा रहा था।
मामला कुरुक्षेत्र के एक युवक रोहित से जुड़ा है, जिसने खुद को डंकी रूट का शिकार बताया है। रोहित के मुताबिक, उसके पिता मनोज कुमार टैक्सी चालक हैं और परिवार ने प्लॉट बेचकर व कर्ज लेकर उसे विदेश भेजने का इंतजाम किया था। पिहोवा निवासी एजेंट विजय शर्मा ने नौ लाख रुपये में सीधे यूरोपीय देश मोल्दोवा भेजने का वादा किया, लेकिन 9 अक्टूबर 2025 को उसे दुबई भेज दिया गया। वहां से रूस का वीजा देकर मॉस्को पहुंचाया गया, जहां एक पाकिस्तानी एजेंट के हवाले कर बेलारूस भेज दिया गया।
रोहित का आरोप है कि बेलारूस पहुंचते ही उससे डॉलर छीन लिए गए और लगातार पैसों की मांग शुरू हो गई। पैसे नहीं मिलने पर उसे कड़ाके की ठंड में तंबू में रहने को मजबूर किया गया। खाने के नाम पर केवल ब्रेड और पैकेटबंद बीफ दिया जाता था। हिंदू होने के कारण उसने बीफ खाने से इनकार कर दिया और कई दिनों तक सिर्फ ब्रेड खाकर गुजारा किया।
पीड़ित के अनुसार, जब प्रताड़ना बढ़ी तो उसने वीडियो कॉल के जरिए परिवार को अपनी हालत बताई। परिवार ने लाखों रुपये और भेजे, लेकिन आरोप है कि रकम एजेंटों तक ही सीमित रही और प्रताड़ना कम होने के बजाय बढ़ती गई। बाद में बेलारूस-लातविया सीमा पार करवाने के दौरान लातविया की सेना ने पकड़ लिया। रोहित का आरोप है कि सैनिकों ने मोबाइल तोड़ दिया, मारपीट की, घंटों बैठाकर रखा और पूछताछ के दौरान करंट के झटके तक दिए।
सीमा से वापस धकेले जाने के बाद वह फिर एजेंटों के चंगुल में फंस गया और आखिरकार बेलारूस की राजधानी मिन्स्क में पुलिस के हवाले कर दिया गया। अदालत के आदेश पर उसे जेल भेज दिया गया, जहां उसने करीब सात महीने बिताए। बाद में भारतीय दूतावास की मदद से इमरजेंसी पासपोर्ट बना और परिवार द्वारा टिकट भेजने के बाद 13 जून को वह भारत लौट सका। अब परिवार एजेंट के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए पुलिस अधीक्षक को शिकायत देने की तैयारी में है। परिवार का दावा है कि पूरे मामले में करीब 11 लाख रुपये खर्च हो गए, जबकि बेटे की जिंदगी भी खतरे में पड़ गई।

