दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) की प्रवेश प्रक्रिया में इस वर्ष बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। सीयूईटी यूजी 2026 के परिणाम घोषित होने के बाद लाखों छात्र जहां पारंपरिक कट-ऑफ सूची का इंतजार कर रहे हैं, वहीं विश्वविद्यालय ने स्पष्ट कर दिया है कि अब पहले की तरह कट-ऑफ जारी नहीं की जाएगी। इसके स्थान पर प्रवेश का आधार मिनिमम एलोकेशन स्कोर (MAS) होगा, जो प्रत्येक आवंटन चरण के बाद जारी किया जाएगा।
CSAS ने बदली प्रवेश प्रक्रिया
सीयूईटी लागू होने से पहले डीयू में दाखिला 12वीं कक्षा के अंकों के आधार पर होता था और कॉलेज अलग-अलग कट-ऑफ सूची जारी करते थे। कई प्रतिष्ठित कॉलेजों और लोकप्रिय पाठ्यक्रमों में कट-ऑफ 99 प्रतिशत तक पहुंच जाती थी।
अब कॉमन सीट एलोकेशन सिस्टम (CSAS) के तहत पूरी प्रवेश प्रक्रिया केंद्रीकृत हो गई है। छात्रों को उनकी सीयूईटी रैंक, श्रेणी, सीटों की उपलब्धता और पसंदीदा कॉलेजों व पाठ्यक्रमों की वरीयता सूची के आधार पर सीटें आवंटित की जाती हैं।
क्या है मिनिमम एलोकेशन स्कोर?
नई व्यवस्था में मिनिमम एलोकेशन स्कोर (MAS) सबसे महत्वपूर्ण संकेतक होगा। यह वह न्यूनतम स्कोर है, जिस पर किसी विशेष कॉलेज और पाठ्यक्रम की अंतिम सीट आवंटित होती है।
प्रवेश के प्रत्येक चरण के बाद विश्वविद्यालय इन आंकड़ों को सार्वजनिक करेगा। इससे छात्रों को यह समझने में मदद मिलेगी कि किस कॉलेज और कोर्स में प्रवेश के लिए कितना स्कोर आवश्यक रहा।
पिछले साल के आंकड़ों ने दिखाई कड़ी प्रतिस्पर्धा
पिछले वर्ष जारी एमएएस आंकड़ों ने डीयू में बढ़ती प्रतिस्पर्धा की स्पष्ट तस्वीर पेश की थी। हिंदू कॉलेज में बीए (ऑनर्स) राजनीति विज्ञान के लिए न्यूनतम आवंटन स्कोर 950.58 रहा, जबकि मिरांडा हाउस में यह 925.98 दर्ज किया गया।
इसी तरह, हिंदू कॉलेज में इतिहास (ऑनर्स) के लिए 914.38 और बीकॉम (ऑनर्स) के लिए 912.22 स्कोर तक सीटें आवंटित हुई थीं। हंसराज कॉलेज, मिरांडा हाउस समेत कई प्रतिष्ठित संस्थानों में लोकप्रिय पाठ्यक्रमों की सीटें 850 से 900 से अधिक अंकों पर बंद हुई थीं।
इस साल भी रहेगा कड़ा मुकाबला
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 में भी शीर्ष कॉलेजों और लोकप्रिय पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी। हालांकि अंतिम मिनिमम एलोकेशन स्कोर छात्रों की संख्या, उपलब्ध सीटों, आरक्षण नीति और सीयूईटी के समग्र प्रदर्शन के आधार पर तय होगा। ऐसे में छात्रों को कट-ऑफ सूची के बजाय प्रत्येक आवंटन चरण में जारी होने वाले एमएएस पर नजर रखनी होगी।
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