दिल्ली में बिजली उपभोक्ताओं को आने वाले समय में बढ़े हुए बिलों का सामना करना पड़ सकता है। वजह यह है कि बिजली वितरण कंपनियों पर बकाया भारी राशि और उसकी वसूली को लेकर चल रहा विवाद अब और तेज हो गया है। अपील पर सुनवाई करते हुए अपीलेट ट्रिब्यूनल (APTEL) ने दिल्ली बिजली नियामक आयोग (DERC) की वह याचिका खारिज कर दी है, जिसमें 30 हजार करोड़ रुपये के पुराने बकाये को चुकाने के लिए और समय देने की मांग की गई थी। यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट के 2025 के आदेश से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि सभी राज्यों और संबंधित बिजली कंपनियों को पुराने बकाये अप्रैल 2028 तक हर हाल में चुकाने होंगे।

दिल्ली इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (DERC) पर बिजली वितरण कंपनियों का करीब 30,000 करोड़ रुपये का बकाया है। इस भारी राशि को एक साथ चुकाने के बजाय चरणबद्ध तरीके से निपटाने और उपभोक्ताओं पर अचानक आर्थिक बोझ न पड़े, इसके लिए DERC ने अतिरिक्त समय देने की मांग की थी। लेकिन अपीलेट ट्रिब्यूनल (APTEL) ने इस याचिका को खारिज कर दिया।

कैसे लोगों की जेब पर पड़ेगा असर?

रिपोर्ट के मुताबिक अब दिल्ली को बिजली क्षेत्र से जुड़े पुराने बकाये का भुगतान तय रिपेमेंट शेड्यूल के अनुसार ही करना होगा। इस पूरे मामले में पहले से ही Supreme Court of India ने निर्देश दिया था कि सभी राज्यों के बिजली नियामक पुराने बकाये की वसूली प्रक्रिया अप्रैल 2024 से शुरू करें और इसे अप्रैल 2028 तक पूरा करें। बकाया राशि को तय समयसीमा में चरणबद्ध तरीके से चुकाना होगा,जरूरत पड़ने पर बिजली दरों में संशोधन या बढ़ोतरी की अनुमति दी जा सकती है, इसका उद्देश्य बिजली कंपनियों की वित्तीय स्थिति को स्थिर करना बताया गया है, इसी आदेश के आधार पर दिल्ली में बिजली नियामक DERC पर भी दबाव बढ़ गया है कि वह वितरण कंपनियों के बकाये का भुगतान तय समय में सुनिश्चित करे। पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली में बिजली दरें अपेक्षाकृत स्थिर और कई बार सब्सिडी के कारण कम बनी रहीं। इससे उपभोक्ताओं को राहत तो मिली, लेकिन बिजली वितरण कंपनियों का राजस्व और लागत संतुलन बिगड़ता गया, जिससे बड़ा बकाया जमा हो गया।

जानकारों के अनुसार, इस बकाये की रिकवरी के लिए दो प्रमुख रास्ते सामने हैं या तो बिजली दरों में बढ़ोतरी की जाए या फिर Delhi Government सब्सिडी बढ़ाकर उपभोक्ताओं को राहत दे। विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे व्यावहारिक विकल्प दोनों का मिश्रण हो सकता है। इसके तहतकुछ हिस्सा सरकार सब्सिडी के रूप में वहन करे और बाकी हिस्सा बिजली कंपनियां टैरिफ बढ़ाकर वसूल करें  इससे अचानक उपभोक्ताओं पर बड़ा बोझ नहीं पड़ेगा, लेकिन वित्तीय संतुलन बनाए रखने के लिए दोनों पक्षों को योगदान देना होगा। कहा जा रहा है कि जब तक कोई वैकल्पिक फंडिंग मॉडल नहीं तैयार होता, तब तकघरेलू बिजली बिलों में बढ़ोतरी संभव है और व्यवसायिक उपभोक्ताओं पर भी अतिरिक्त भार पड़ सकता है।

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