दुर्गेश राजपूत, नर्मदापुरम। मध्य प्रदेश के ​नर्मदापुरम में नर्मदा घाटी की ऐतिहासिक और पुरातात्विक संपदा में भगवान गणेश की प्राचीन मूर्तियों का विशेष स्थान है। जिला पुरातत्व संग्रहालय नर्मदापुरम में संरक्षित चार दुर्लभ गणेश प्रतिमाएं इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि नर्मदांचल में कुषाण काल से ही गणेश पूजन की समृद्ध परंपरा रही है।

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इतिहासकार हंसा व्यास के अनुसार नर्मदापुरम और सोहागपुर क्षेत्र से प्राप्त ये चारों प्रतिमाएं चतुर्भुजी रूप में हैं। इनमें से कुछ प्रतिमाएं नृत्य मुद्रा में हैं, तो कुछ में चक्ररूप, हाथों में मोदक, त्रिशूल, सर्प और वाहन मूषक स्पष्ट दिखाई देते हैं। लाल व सफेद बलुआ पत्थर और काले चिकने पत्थर से तराशी गई ये मूर्तियां कला का अद्भुत नमूना हैं। पांचवीं-छठवीं शताब्दी के दौरान गुप्त, शुंग, सातवाहन, वाकाटक और राजपूत शासकों ने शैव धर्म के अनुयायी होने के कारण शिव परिवार के साथ गणेश प्रतिमाओं का व्यापक निर्माण कराया। इतिहासकार व्यास बताती हैं कि नर्मदा घाटी से लेकर चंबल घाटी (मंदसौर के हिंगलाजगढ़ व भोजपुर) तक मूर्तिकला में एक अद्भुत समानता देखने को मिलती है। बिना किसी आधुनिक मापदंड के शिल्पकारों द्वारा छैनी-हथौड़ी से बनाई गई इन एक समान प्रतिमाओं का रहस्य आज भी गहन शोध का विषय है।

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धार्मिक पहलू के साथ गणेश उत्सव का सामाजिक व राजनीतिक इतिहास भी बेहद गौरवशाली रहा है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में मुंबई दंगों के बाद समाज को एकजुट करने और अंग्रेजों के प्रतिबंधों से बचने के लिए इसे राष्ट्रीय उत्सव का रूप दिया था। ​नर्मदापुरम में महाराष्ट्र सीमा के समीप होने के कारण 1920 के आसपास गणेश उत्सव की शुरुआत हुई। शहर के गोल घाट (काले महादेव) में सबसे प्राचीन प्रतिमा स्थापित है, जबकि हलवाई चौक, सराफा चौक और इतवारा बाजार में सबसे पुराने पंडाल सजने की परंपरा आज भी जारी है।

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