हेमंत शर्मा, इंदौर। कमिश्नरी सिस्टम लागू होने के बाद शहर और ग्रामीण पुलिस के बीच संसाधनों का बंटवारा तो हुआ, लेकिन ट्रैफिक व्यवस्था के मामले में ग्रामीण पुलिस आज भी गंभीर संकट से जूझ रही है। हालात यह हैं कि पिछले एक साल में ग्रामीण क्षेत्र में सड़क हादसों में 400 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, लेकिन इसके बावजूद ग्रामीण पुलिस को अब तक अलग से पर्याप्त यातायात बल उपलब्ध नहीं कराया गया है।
इंदौर में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम वर्ष 2021 से लागू
बता दें कि मध्यप्रदेश सरकार ने इंदौर में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम वर्ष 2021 में लागू किया था। इसके बाद शहर और ग्रामीण पुलिस की जिम्मेदारियां अलग-अलग कर दी गईं। कमिश्नरी व्यवस्था लागू होने के बाद शहर के हिस्से में 36 थाने और ग्रामीण क्षेत्र के हिस्से में 12 थाने आए। पुलिस बल का बंटवारा भी 75 प्रतिशत शहर और 25 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र के हिसाब से किया गया, लेकिन यातायात शाखा का 25 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण पुलिस को नहीं मिल सका। यही वजह है कि लगातार बढ़ते सड़क हादसों और भारी वाहनों की आवाजाही के बीच ग्रामीण पुलिस के सामने ट्रैफिक नियंत्रण बड़ी चुनौती बन गया है।
300 पुलिसकर्मियों की आवश्यकता
ग्रामीण क्षेत्र में एक भी समर्पित यातायात थाना नहीं है। ऐसे में वाहनों की जांच, चालानी कार्रवाई, ट्रैफिक अभियान और दुर्घटना रोकथाम जैसे काम सीमित संसाधनों के सहारे किए जा रहे हैं। ग्रामीण पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कई राष्ट्रीय और राज्य राजमार्ग उनके अधिकार क्षेत्र से गुजरते हैं, जहां हर दिन हजारों वाहन निकलते हैं। इसके बावजूद पर्याप्त ट्रैफिक स्टाफ नहीं होने के कारण प्रभावी निगरानी नहीं हो पा रही है। हादसों के बढ़ते आंकड़े भी इसी कमी की ओर इशारा कर रहे हैं। एसडीओपी उमाकांत चौधरी के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र में यातायात व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए करीब 300 पुलिसकर्मियों की आवश्यकता है।
अतिरिक्त यातायात बल उपलब्ध कराने की मांग
वर्तमान में जरूरत के मुताबिक बल उपलब्ध नहीं है। मजबूरी में आईजी कार्यालय के पास उपलब्ध रिजर्व बल के सहारे व्यवस्थाएं संभाली जा रही हैं। स्थिति यह भी है कि कमिश्नरी सिस्टम लागू होने के कई साल बाद भी ग्रामीण पुलिस के लिए न तो अलग डीआरपी लाइन विकसित हो सकी है और न ही अतिरिक्त बल की स्थायी व्यवस्था हो पाई है। 12 थानों के विस्तृत क्षेत्र में कानून-व्यवस्था और ट्रैफिक दोनों संभालना पुलिस के लिए मुश्किल होता जा रहा है। अब ग्रामीण पुलिस ने गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर अतिरिक्त यातायात बल उपलब्ध कराने की मांग की है।
अन्य संसाधनों का बंटवारा
पुलिस अधिकारियों का तर्क है कि जिस तरह कमिश्नरी व्यवस्था के दौरान अन्य संसाधनों का बंटवारा किया गया था, उसी तरह ट्रैफिक स्टाफ का 25 प्रतिशत हिस्सा भी ग्रामीण क्षेत्र को मिलना चाहिए था। फिलहाल यह मांग मंत्रालय के विचाराधीन है।
बड़ा सवाल यह है कि जब हादसों में 400 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है, तब आखिर ग्रामीण क्षेत्र को आवश्यक ट्रैफिक संसाधन कब मिलेंगे? जब तक अतिरिक्त बल और ट्रैफिक ढांचा नहीं मिलता, तब तक इंदौर ग्रामीण पुलिस के सामने यातायात व्यवस्था को संभालना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा।


