प्रमोद निर्मल, मोहला-मानपुर। अगर कोई यह कहे कि डाकघर के कर्मचारी अपने डाकघर दफ्तर में बैठकर विभागीय कार्य कर रहे हैं, तो यह बात आम और सामान्य लगती है। लेकिन यदि कोई यह कहे कि डाकघर के दफ्तर में भेड़, बकरी और मुर्गे रहते हैं। वहीं डाककर्मी किसी पेड़ के नीचे अथवा ग्रामीणों के खुले मचान के नीचे खाट पर बैठकर प्रशासनिक कार्य का संपादन करते हैं, तो आप चकित हो जाएंगे। आइए आपको आज ऐसे ही डाकघर के बारे में बताते हैं, जो अपने आप में अजब तो है ही, बल्कि इसके स्थापना और संचालन की कहानी भी गजब की है।

बांस की झोपड़ी में डाकघर, अंदर मवेशियों का डेरा
बांस की पैबंद से बना झोपड़ीनुमा घर और इस घर के बाहर लटकता डाक विभाग का बोर्ड और लेटर बॉक्स यह बताने के लिए काफी है कि यह एक पोस्ट ऑफिस यानी डाकघर का दफ्तर है। प्रशासन द्वारा निर्धारित इस वैकल्पिक डाकघर दफ्तर के भीतर डाककर्मी नहीं, बल्कि बकरियां, मुर्गियां और अन्य मवेशी मौजूद हैं। यह दृश्य आपको न केवल पहले से ज्यादा हैरान करेगा, बल्कि यह सोचने पर भी मजबूर कर देगा कि प्रशासनिक व्यवस्था का आखिर यह कौन सा रूप है, जो सिस्टम की लाचारी को बयां कर रहा है।

एक साल बाद भी नहीं बना स्थायी भवन
प्रशासनिक उदासीनता की पराकाष्ठा को दर्शाती यह तस्वीर आदिवासी बहुल मानपुर ब्लॉक के कोराचा ग्राम पंचायत अंतर्गत हजारों फीट ऊंचे पहाड़ों और बीहड़ों के बीच बसे ग्राम सुड़ियाल के डाकघर की है। दरअसल, लगभग एक वर्ष पहले जून 2025 में इस नवीन डाकघर की शुरुआत की गई थी। कभी नक्सलियों का गढ़ रहे इस क्षेत्र के लोगों को डाक सेवा, वित्तीय सेवाओं और अन्य सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ पहुंचाने की मंशा से इसकी स्थापना की गई थी।

महज 6 से 7 परिवार की बसाहट वाले इस छोटे से गांव में डाकघर खोलने की मंजूरी शासन से मिलने के बाद जिला प्रशासन ने यहां गांव के पटेल द्वारा खुद के और अपने मवेशियों के रहने के लिए बांस से बनाए गए दो हिस्सों वाले झोपड़ीनुमा घर को वैकल्पिक तौर पर डाकघर का दफ्तर निर्धारित कर यहां डाकघर का संचालन शुरू कर दिया। लेकिन आज डाकघर के संचालन को शुरू हुए एक साल बीतने के बाद भी जिम्मेदार प्रशासन यहां एक छोटा सा डाकघर भवन तक नहीं बना सका।
हालात ऐसे हैं कि आनन-फानन में डाकघर दफ्तर निर्धारित किए गए ग्राम पटेल के इस झोपड़ीनुमा घर के एक हिस्से में बकरियों और मुर्गियों का डेरा रहता है, जबकि झोपड़ी के दूसरे हिस्से में पटेल का परिवार रहता है। वहीं डाककर्मी को अपने विभागीय कार्यों का संपादन किसी पेड़ अथवा मचान के नीचे खाट पर बैठकर करना पड़ता है।
मसला केवल डाकघर भवन के अभाव का नहीं है। बल्कि एक ऐसा गांव जो शासन के रिकॉर्ड में आज भी महज दो रहवासी परिवार वाला गांव है। वो गांव जो नक्सल दंश के चलते एक बार उजड़ जाने के बाद अभी हाल ही के कुछ साल के दरमियान 4-5 नए परिवारों की नई बसाहट से बमुश्किल दोबारा रौशन होने की राह तलाश रहा है। जहां पहुंचने के लिए हजारों फीट ऊंचे पहाड़ों में पथरीले कच्चे रास्तों से होकर जोखिम भरा सफर तय करना पड़ता है। जिस गांव में बिजली तक नहीं है और जहां ग्रामीणों के बीच किसी प्रकार की पत्र-व्यवहार की सुविधा लगभग एक कोरी कल्पना के समान है, उस गांव में डाकघर की स्थापना भी समझ से परे है। प्रशासनिक कारिंदे भले ही इस डाकघर को भविष्य में ग्रामीण विकास का आधार बताकर इसकी स्थापना को उचित ठहरा रहे हों, लेकिन इस डाकघर के संचालन की जो वर्तमान तस्वीर है, वह प्रशासनिक व्यवस्था और शासन की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करती है, इसमें भी कोई दो राय नहीं है।
दुर्गम रास्तों से 10 किमी का सफर तय कर पहुंचते हैं कर्मचारी
दूसरी ओर इस बदइंतजामी का बड़ा खामियाजा इस डाकघर के प्रभारी डाककर्मी को भुगतना पड़ रहा है। उन्हें घनघोर जंगल और पहाड़ी दुर्गम कच्चे रास्तों से होकर, जंगली जानवरों के खतरे के बीच लगभग 10 किलोमीटर का जोखिम भरा सफर तय कर गांव तक पहुंचना पड़ता है। एक महिला डाककर्मी के लिए तो यहां अपनी सेवा में उपस्थित होना और भी अधिक कठिनाइयों भरा है।
इसके बावजूद, सभी परेशानियों को झेलते हुए ये डाककर्मी समय पर यहां पहुंचकर अपनी सेवाएं क्षेत्रवासियों को दे रहे हैं, जो निस्संदेह उनकी कर्तव्यनिष्ठा को प्रदर्शित करता है। विपरीत परिस्थितियों में भी ये डाककर्मी डाक विभाग के माध्यम से वित्तीय एवं अन्य सेवाओं का लाभ ग्रामीणों तक पहुंचा रहे हैं, जिसमें खाता खोलने जैसे विभागीय कार्यों में जुटे हुए हैं। वहीं ग्रामीण भी इस डाकघर के जरिए कुछ शुरुआती सुविधाएं मिलने से संतुष्ट हैं, लेकिन बिना भवन के डाकघर संचालन को लेकर व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए वे जल्द यहां स्थायी डाकघर भवन बनाए जाने की मांग कर रहे हैं।
बांस की झोपड़ी में पोस्ट ऑफिस का देखिये वीडियो-
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