​गया। जिले के बहुचर्चित सुमीरक यादव हत्याकांड में शुक्रवार को 13 साल बाद न्यायपालिका ने अपना बहुप्रतीक्षित फैसला सुना दिया है। एडीजे-3 अजित कुमार की अदालत ने सबूतों के अभाव में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के पूर्व विधायक रणजीत यादव सहित चार आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया है। इस फैसले ने इलाके की राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।

​कोर्ट ने क्यों दिया रिहाई का आदेश?

​अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त और पुख्ता साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा। सबूतों के पुख्ता न होने के आधार पर कोर्ट ने पूर्व विधायक रणजीत यादव के साथ-साथ उनके भाई विवेक यादव, साला पंकज यादव और एक अन्य सहयोगी दीपू को भी साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण कुमार शर्मा और शकील अहमद ने प्रभावशाली दलीलें पेश कीं, जिसे कोर्ट ने स्वीकार किया।

​क्या था पूरा मामला?

​यह हत्याकांड अतरी विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का परिणाम था। साल 2013 के दौरान क्षेत्र में दो राजनीतिक गुटों के बीच भारी तनाव बना हुआ था। 26 फरवरी 2013 को जदयू कार्यकर्ता सुमीरक यादव की नृशंस हत्या कर दी गई थी। हमलावरों ने उन्हें लाठी-डंडों और लोहे की रॉड से पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया था।

​राजनीतिक वर्चस्व बनी मौत की वजह

​इस हत्या के पीछे का मुख्य कारण अतरी विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक विस्तार को माना गया। उस समय इलाके में पूर्व राजद विधायक राजेंद्र यादव और उनके परिवार का एकछत्र दबदबा था। स्थानीय लोगों के अनुसार उनके खौफ के कारण कोई भी अन्य राजनीतिक दल वहां अपना कार्यालय खोलने का साहस नहीं जुटा पाता था।
​वर्ष 2010 में जब जदयू विधायक कृष्णन यादव के नेतृत्व में नीमचक बथानी में जदयू का नया कार्यालय खोला गया तो सुमीरक यादव इसकी कमान संभालने में सबसे आगे थे। सुमीरक की बढ़ती सक्रियता और जदयू का प्रभाव विरोधियों को खटकने लगा था जो अंततः उनकी हत्या की वजह बनी। 13 साल तक चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अब अदालत ने इस मामले में सभी नामजद आरोपियों को बरी कर दिया है।