आशुतोष तिवारी, जगदलपुर। बस्तर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान गोंचा महापर्व इस बार एक नई मिसाल के साथ इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। करीब 619 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में पहली बार भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से पहले 100 तुपकियों की सामूहिक सलामी दी गई। जैसे ही भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा रथारूढ़ हुए, तुपकियों की गूंज से पूरा जगदलपुर भक्तिमय वातावरण में डूब गया।
बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचन्द्र भंजदेव ने इसे परंपरा और युवा शक्ति के संगम का ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि तुपकी की यह परंपरा केवल बस्तर की पहचान है, जो दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलती। इस बार 360 आरण्यक एवं उत्कल ब्राह्मण समाज के प्रयास से 100 युवाओं ने एक साथ तुपकी की सलामी देकर सदियों पुरानी विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने का संदेश दिया।


भक्तों ने जयघोष के साथ खींचा भगवान का रथ
गोंचा महापर्व की शुरुआत भगवान के नेत्रोत्सव और चांदी के झाड़ू से होने वाली छेरा-पोहरा की परंपरा के साथ हुई। इसके बाद श्रद्धालुओं ने जयघोष के बीच भगवान के रथ को खींचकर नगर भ्रमण कराया। मंदिर समिति के अनुसार यह महापर्व 619 वर्षों से रियासतकालीन परंपरा के अनुसार मनाया जा रहा है।

9 दिनों तक सिरहासार जनकपुरी में रहेंगे प्रभु जगन्नाथ
भगवान जगन्नाथ अब 9 दिनों तक सिरहासार जनकपुरी में विराजमान रहकर श्रद्धालुओं को दर्शन देंगे और 24 जुलाई को बहुड़ा गोंचा के अवसर पर पुनः श्री मंदिर लौटेंगे। इस बार गोंचा महापर्व सिर्फ आस्था का उत्सव नहीं रहा, बल्कि 100 तुपकियों की पहली ऐतिहासिक सलामी ने बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान और नई ऊर्जा दी है।
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