Dharm Desk – हिंदू धर्म में गुरु प्रदोष व्रत भगवान शिव और देवगुरु बृहस्पति की कृपा प्राप्त करने का अत्यंत शुभ अवसर है. ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 28 मई, गुरुवार को पड़ रही है. इसलिए इसीदिन गुरु प्रदोष व्रत रखा जाएगा. त्रयोदशी तिथि का आरंभ 28 मई सुबह 7:56 बजे से होगा और इसका समापन 29 मई सुबह 9:50 बजे तक रहेगा. इस व्रत की मुख्य पूजा सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में की जाती है. जो इस दिन शाम को लगभग 7 बजे से 9 बजे के बीच रहेगा. इस व्रत को करने से जीवन की बाधाएं दूर होती है, शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है. विशेष रूप से जिन लोगों की कुंडली में बृहस्पति ग्रह कमजोर होता है. उनके लिए यह व्रत लाभकारी माना जाता है. इससे ज्ञान, मान-सम्मान और पारिवारिक सुख में वृद्धि होती है. संतान प्राप्ति और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करने वालों के लिए भी यह व्रत शुभ फल देने वाला माना गया है.

प्रदोष व्रत प्रारंभ करने की विधि

व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ या पीले वस्त्र धारण करें. इसके बाद भगवान शिव का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें. दिनभर निराहार रहें या फलाहार करें. शाम के समय पुनः स्नान कर पूजा स्थल को शुद्ध करें और प्रदोष काल में शिवलिंग का गंगाजल, दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक करे. भगवान शिव को बेलपत्र, चंदन, धतूरा और अक्षत अर्पित करें. गुरु प्रदोष होने के कारण पीले फूल और बेसन के लड्डू का भोग लगाना शुभ माना जाता है.

प्रदोष व्रत में इन मंत्रों का जाप करे

पूजा के दौरान ओम नमः शिवाय या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें और प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें. अंत में शिव-पार्वती की आरती कर प्रसाद ग्रहण करें. व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है.

प्रदोष व्रत में दान करना चाहिए

इस दिन चने की दाल या गुड़ का दान करना लाभकारी होता है. साथ ही पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है. ध्यान रखें कि शिव पूजा में तुलसी और केतकी के फूल का उपयोग नहीं किया जाता है. प्रदोष काल में की गई शिव आराधना अत्यंत फल देने वाली कहलाती है. विधि-विधान से किया गया गुरु प्रदोष व्रत जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने वाला है.