हरियाणा का हांसी क्षेत्र गेहूं-धान की पारंपरिक फसलों को छोड़कर आधुनिक तकनीक से घीया-तोरी जैसी सब्जियों के उत्पादन का बड़ा केंद्र बन गया है। यहां के प्रगतिशील किसान ड्रिप सिंचाई और उन्नत बीजों की मदद से हर सीजन में प्रति एकड़ एक लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ अर्जित कर रहे हैं।

हांसी। क्षेत्र अब सिर्फ पारंपरिक धान और गेहूं की फसलों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह इलाका तेजी से हरी सब्जियों के एक बड़े उत्पादक केंद्र के रूप में उभर रहा है। क्षेत्र के ढाणी पिरान, ढाणी पुरिया, ढाणी शांकरी, सिकंदरपुर और ढाणा जैसे ग्रामीण इलाकों में बड़े स्तर पर तोरी, घीया और चप्पल कद्दू जैसी फसलों की पैदावार की जा रही है। बाजार में बढ़ती मांग के हिसाब से किए जा रहे इस बदलाव ने स्थानीय कृषकों की आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार किया है। उत्तम गुणवत्ता के दम पर यहां उगाई जाने वाली सब्जियां अब हरियाणा समेत दिल्ली और पंजाब के बाजारों में अपनी खास धाक जमा चुकी हैं।

आधुनिक पद्धतियों का बेहतर इस्तेमाल

यहां के किसान अब खेती की पुरानी लकीर छोड़कर ड्रिप इरिगेशन (टपकन सिंचाई), उन्नत किस्म के बीजों और जैविक खाद के प्रयोग पर विशेष बल दे रहे हैं। इन वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने से एक तरफ जहां फसल की पैदावार में बढ़ोतरी हुई है, वहीं दूसरी तरफ खेती की लागत में भी भारी कमी आई है। स्वाद और ताजगी के कारण इन सब्जियों को मंडियों में हाथों-हाथ लिया जाता है। खेतों से सीधे बाजार तक माल पहुंचने से बिचौलियों की भूमिका कम हुई है और उत्पादकों को अपनी फसल के बेहद वाजिब दाम मिल रहे हैं।

प्रति एकड़ लाख रुपये का लाभ

सब्जी उत्पादन से जुड़े ढाणी पिरान गांव के प्रगतिशील किसान सुखदेव ने बताया कि पारंपरिक फसलों में लगातार बढ़ती लागत और घटते मुनाफे से परेशान होकर उन्होंने सब्जियों की तरफ रुख किया था। नई तकनीकों और वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए अब वे हर सीजन में प्रति एकड़ से लगभग एक लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं। नकद फसल होने की वजह से सब्जियों की खेती से किसानों के पास नियमित रूप से पैसे आते रहते हैं, जिससे उनकी दैनिक जरूरतें आसानी से पूरी हो जाती हैं।

तुरंत भुगतान से बढ़ी सहूलियत

सुखदेव के मुताबिक सब्जियों के व्यापार में सबसे अच्छी बात यह है कि फसल बेचते ही उसका पैसा तुरंत मिल जाता है और बाजार में उधारी का कोई चक्कर नहीं रहता। इस काम में घर के सभी सदस्य हाथ बंटाते हैं, जिससे मजदूरी पर होने वाला खर्च बच जाता है और उत्पादन लागत काफी हद तक नियंत्रित रहती है। किसानों का कहना है कि उन्हें समय-समय पर सरकारी योजनाओं के तहत सब्सिडी का लाभ भी प्राप्त होता है। यदि प्रशासन की तरफ से प्रोत्साहन और सुविधाएं थोड़ी और बढ़ाई जाएं, तो क्षेत्र के कई अन्य किसान भी इस मुनाफेदार खेती की ओर आकर्षित होंगे।

उत्तर भारत में बनी पहचान

हांसी की उपजाऊ भूमि और यहां का मौसम सब्जी की खेती के लिए बेहद मुफीद साबित हो रहा है। यही वजह है कि यहां उत्पादित होने वाली तोरी, घीया और चप्पल कद्दू जैसी सब्जियां गुणवत्ता के मामले में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं और थोक बाजारों में इन्हें ऊंचे भाव मिलते हैं। बाजार की मांग को भांपकर की जा रही इस खेती से किसानों की संपन्नता बढ़ रही है। हांसी के किसानों की यह कामयाबी यह साबित करती है कि अगर सही सोच, नई तकनीक और आधुनिक तौर-तरीकों का मेल हो, तो कम रकबे में भी खेती को एक मुनाफेदार व्यवसाय बनाया जा सकता है।