कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़। हरियाणा की राजनीति में कभी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में जिन चेहरों को गंभीर दावेदार माना जाता था, उनके मौजूदा राजनीतिक ठिकाने को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। भाजपा की हालिया संगठनात्मक तस्वीर में कुलदीप बिश्नोई, कैप्टन अभिमन्यु, रामबिलास शर्मा और चौधरी कंवरपाल गुर्जर जैसे अनुभवी नेताओं को न राज्यसभा में जगह मिली, न प्रदेश संगठन की नई टीम में और न ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रमुख भूमिका दिखाई दी। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि क्या भाजपा के भीतर इन नेताओं का प्रभाव पहले की तुलना में सीमित हो रहा है?

चारों नेताओं का कभी था बड़ा राजनीतिक कद

इन चारों नेताओं की पहचान हरियाणा भाजपा की पुरानी और मजबूत राजनीतिक धारा से रही है। इनमें से कुछ चेहरे ऐसे रहे हैं जिनके नाम अलग-अलग दौर में मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों के तौर पर चर्चा में आते रहे। किसी के पास संगठन का लंबा अनुभव रहा तो किसी ने सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।

कुलदीप बिश्नोई की राजनीति का आधार लंबे समय तक हिसार और आदमपुर क्षेत्र रहा है। कांग्रेस से भाजपा में आने के बाद उनके परिवार की राजनीतिक पकड़ और प्रदेश की राजनीति में उनका प्रभाव लगातार चर्चा का विषय रहा। विधानसभा चुनावों से लेकर संगठनात्मक राजनीति तक उनका नाम एक प्रभावशाली नेता के रूप में लिया जाता रहा है।

कैप्टन अभिमन्यु भाजपा के उन नेताओं में रहे हैं जिन्हें पार्टी के मजबूत संगठनात्मक चेहरों में गिना जाता था। वह मनोहर लाल सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। उनके राजनीतिक अनुभव और संगठन में सक्रिय भूमिका के चलते उनका नाम भी मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरों में चर्चा में रहा।

रामबिलास शर्मा हरियाणा भाजपा के सबसे पुराने और अनुभवी नेताओं में शामिल रहे हैं। महेंद्रगढ़ क्षेत्र से उनकी लंबी राजनीतिक पारी रही है और संगठन को खड़ा करने में उनकी भूमिका को भाजपा के भीतर महत्वपूर्ण माना जाता रहा। सरकार में मंत्री रहने के साथ वह प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भी रहे।

वहीं चौधरी कंवरपाल गुर्जर भी भाजपा के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं। विधानसभा अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री जैसे पदों पर रह चुके कंवरपाल गुर्जर की यमुनानगर और आसपास के क्षेत्रों में मजबूत राजनीतिक पहचान रही है।

सवाल पद का नहीं, पार्टी में बदलती भूमिका का

इन नेताओं को हालिया संगठनात्मक व्यवस्था में प्रमुख स्थान नहीं मिलने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा अब हरियाणा में नेतृत्व की नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की रणनीति पर चल रही है?

भाजपा की राजनीति में संगठनात्मक पद हमेशा किसी नेता के राजनीतिक भविष्य का अंतिम पैमाना नहीं होते। पार्टी कई बार वरिष्ठ नेताओं को संगठन से बाहर रखकर भी दूसरे दायित्व दे सकती है। इसलिए केवल पद न मिलने के आधार पर इन नेताओं के राजनीतिक करियर के खत्म होने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा।

लेकिन राजनीतिक संकेतों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब कभी मुख्यमंत्री पद की संभावनाओं वाले नेताओं का नाम लगातार सत्ता और संगठन की मौजूदा तस्वीर से बाहर दिखाई दे।

नई पीढ़ी के हाथ में कमान, पुराने चेहरों की भूमिका क्या होगी?

हरियाणा भाजपा में पिछले कुछ समय से नेतृत्व का चेहरा और संगठनात्मक ढांचा तेजी से बदला है। नई पीढ़ी के नेताओं को जिम्मेदारियां मिल रही हैं और पार्टी क्षेत्रीय समीकरणों के हिसाब से नए चेहरों को आगे बढ़ा रही है।

ऐसे में कुलदीप बिश्नोई, कैप्टन अभिमन्यु, रामबिलास शर्मा और कंवरपाल गुर्जर के सामने चुनौती केवल पद हासिल करने की नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की भी है।

क्या पार्टी आने वाले समय में इन अनुभवी नेताओं को कोई नई जिम्मेदारी देगी? क्या उन्हें विधानसभा या संगठन से बाहर किसी बड़े राजनीतिक मिशन में लगाया जाएगा? या फिर भाजपा का नया नेतृत्व धीरे-धीरे पुराने दिग्गजों की जगह ले चुका है?

क्या राजनीतिक करियर पर लगा सवालिया निशान?

फिलहाल इसे इन नेताओं के राजनीतिक करियर का अंत कहना उचित नहीं होगा। चारों नेताओं के पास लंबा राजनीतिक अनुभव, समर्थकों का आधार और अपने-अपने क्षेत्रों में पहचान है। लेकिन इतना जरूर है कि पार्टी के मौजूदा सत्ता-संगठन ढांचे में उनकी भूमिका पहले जैसी दिखाई नहीं दे रही।

यही बदलाव अब हरियाणा भाजपा की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। सवाल यह नहीं कि इन चारों नेताओं की राजनीति खत्म हो गई है या नहीं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि भाजपा के नए दौर में इन दिग्गजों के लिए अगली राजनीतिक भूमिका क्या होगी?