पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अस्थायी लेक्चररों की याचिका पर सरकार को 6 माह में निर्णय लेने को कहा है। समय सीमा के उल्लंघन पर अधिकारी को जुर्माना भरना होगा।

पंचकूला। जिले में स्थित पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य के उच्च शिक्षा विभाग में कार्यरत कंप्यूटर साइंस, कॉमर्स और मैनेजमेंट के अस्थायी व्याख्याताओं को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने इन लेक्चररों के नियमितीकरण की मांग वाली याचिकाओं का निपटारा करते हुए हरियाणा सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह याचिकाकर्ताओं के दावों पर छह महीने के भीतर विधिसम्मत निर्णय ले। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि वे वर्षों से सेवाएं दे रहे हैं और उन्हें वर्ष 2014 की नियमितीकरण नीति का लाभ मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के हालिया ‘मदन सिंह बनाम हरियाणा राज्य’ फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने अपने नियमितीकरण का दावा मजबूती से पेश किया है।

छह माह में नियमितीकरण पर निर्णय

अदालत में राज्य सरकार की ओर से आश्वासन दिया गया कि यदि याचिकाकर्ता चार सप्ताह के भीतर अपना औपचारिक प्रतिनिधित्व (Representation) सक्षम अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, तो उच्च शिक्षा विभाग के निदेशक इस पर विचार करेंगे। निदेशक को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और मौजूदा नियमों के आलोक में प्रत्येक मामले का विस्तृत और तर्कसंगत निपटारा करना होगा। अदालत ने इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए छह महीने की स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित की है। यह निर्देश अस्थायी रूप से कार्यरत उन हजारों शिक्षकों के लिए आशा की एक नई किरण लेकर आया है, जो लंबे समय से अपनी नौकरियों को सुरक्षित और नियमित करने की राह देख रहे थे।

देरी पर 50 हजार का हर्जाना

हाईकोर्ट ने इस आदेश के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि समय-सीमा का पालन अनिवार्य है। यदि उच्च शिक्षा विभाग का संबंधित अधिकारी छह महीने की निर्धारित अवधि के भीतर इन मामलों पर अंतिम निर्णय नहीं लेता है, तो उसे प्रत्येक याचिकाकर्ता को 50 हजार रुपये का हर्जाना व्यक्तिगत रूप से देना होगा। अदालती आदेश की इस कठोर शर्त ने प्रशासन में जवाबदेही तय कर दी है। अब सभी की निगाहें उच्च शिक्षा निदेशक के अगले कदम पर टिकी हैं, जिससे स्पष्ट हो सकेगा कि इन व्याख्याताओं के भविष्य पर सरकार का अंतिम रुख क्या रहने वाला है।