कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने दावा किया कि हरियाणा में हर साल 13 हजार नवजात शिशुओं की मौत हो रही है। उन्होंने सरकार की उपलब्धियों पर सवाल उठाते हुए इसे आत्ममंथन का विषय बताया है।
कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़। हरियाणा में शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) को लेकर सियासत तेज हो गई है। एक ओर राज्य सरकार सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) रिपोर्ट 2024 के आधार पर शिशु मृत्यु दर में सुधार और राष्ट्रीय औसत तक पहुंचने को बड़ी उपलब्धि बताकर अपनी पीठ थपथपा रही है, वहीं विपक्ष ने इन्हीं आंकड़ों के सहारे सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रणदीप सुरजेवाला ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए दावा किया है कि हरियाणा में हर साल हजारों नवजात बच्चे अपना पहला जन्मदिन देखने से पहले ही दम तोड़ रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि देश के आर्थिक और औद्योगिक रूप से अग्रणी राज्यों में गिने जाने वाले हरियाणा के लिए क्या सिर्फ राष्ट्रीय औसत तक पहुंचना उपलब्धि मानी जानी चाहिए?
रणदीप सुरजेवाला ने अपने बयान में कहा कि हरियाणा में हर वर्ष करीब 5.5 लाख बच्चों का जन्म होता है, लेकिन चिंताजनक स्थिति यह है कि इनमें से 13 हजार से अधिक बच्चे एक वर्ष की आयु पूरी करने से पहले ही मौत का शिकार हो जाते हैं। उन्होंने दावा किया कि राज्य में वर्तमान शिशु मृत्यु दर 24 प्रति हजार जीवित जन्म तक पहुंच चुकी है, यानी हर 1,000 बच्चों में से 24 बच्चे अपना पहला जन्मदिन देखने से पहले ही दम तोड़ रहे हैं। उन्होंने इसे केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों का दर्द बताया, जो हर साल अपने नवजात बच्चों को खो देते हैं।
विपक्ष ने यह भी मुद्दा उठाया कि 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर (Under-5 Mortality Rate) हरियाणा में और अधिक गंभीर स्थिति में है, जो 31 प्रति 1,000 जीवित जन्म बताई जा रही है। यानी केवल नवजात ही नहीं, बल्कि पांच साल तक के बच्चों की जान बचाने की चुनौती भी प्रदेश में गंभीर बनी हुई है।
सुरजेवाला ने दावा किया कि प्रदेश में होने वाली कुल मौतों में करीब 6.7 प्रतिशत मौतें एक वर्ष से कम उम्र के बच्चों की होती हैं, अर्थात राज्य में होने वाली हर 13वीं मौत ऐसे मासूम की है जिसने एक साल की उम्र भी पूरी नहीं की।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच के अंतर को लेकर भी विपक्ष ने सरकार को घेरा है। सुरजेवाला के अनुसार, प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में हालात और अधिक खराब हैं, जहां शिशु मृत्यु दर 27 प्रति हजार जीवित जन्म तक पहुंच चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोर पहुंच, कुपोषण, गर्भवती महिलाओं की समय पर जांच और इलाज में दिक्कतें तथा सुरक्षित संस्थागत प्रसव की कमी से नवजात बच्चों की जान को अधिक खतरा बना हुआ है।
कांग्रेस नेता ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि अस्पतालों में NICU (Neonatal Intensive Care Unit – नवजात गहन चिकित्सा इकाई) और PICU (Pediatric Intensive Care Unit – बाल गहन चिकित्सा इकाई) जैसी जरूरी सुविधाओं की कमी अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। उनका कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत और सरकारी दावों के बीच बड़ा अंतर नजर आता है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार केवल आंकड़ों की प्रस्तुति के जरिए उपलब्धियों का दावा कर रही है, जबकि वास्तविकता में स्वास्थ्य तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत है।
हालांकि, राज्य सरकार का दावा इससे अलग है। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि हरियाणा ने पिछले पांच वर्षों में शिशु मृत्यु दर में लगभग 14 प्रतिशत सुधार किया है और अब राज्य राष्ट्रीय औसत के बराबर पहुंच गया है। सरकार एसएनसीयू (Special Newborn Care Unit – विशेष नवजात देखभाल इकाई), एनबीएसयू (Newborn Stabilization Unit – नवजात स्थिरीकरण इकाई), एनआरसी (Nutrition Rehabilitation Center – पोषण पुनर्वास केंद्र), जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम और मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने का दावा कर रही है।
लेकिन सवाल अब भी बरकरार है- क्या हरियाणा जैसे विकसित राज्य के लिए सिर्फ राष्ट्रीय औसत तक पहुंचना उपलब्धि है, जबकि पड़ोसी पंजाब जैसे राज्य शिशु मृत्यु दर को 16 प्रति हजार जीवित जन्म तक ला चुके हैं? सरकार सुधार की रफ्तार पर खुश है, लेकिन विपक्ष का कहना है कि जब हर साल 13 हजार से ज्यादा मासूम अपनी पहली सालगिरह से पहले दम तोड़ रहे हों, तब जश्न नहीं, आत्ममंथन की जरूरत है।

