हरियाणा और राजस्थान के बीच हुए यमुना जल समझौते को लेकर प्रदेश में राजनीति पूरी तरह गर्मा गई है। कांग्रेस ने इस फैसले को राज्य के जनहित और किसानों के अधिकारों के खिलाफ बताते हुए कड़ा विरोध जताया है।
कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़। यमुना जल परियोजना को लेकर हरियाणा और राजस्थान के बीच हुए एमओयू के बाद प्रदेश की राजनीति गर्मा गई है। समझौते पर विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया है और इसे हरियाणा के हितों के खिलाफ बताया जा रहा है।
कांग्रेस का कहना है कि जब दक्षिण हरियाणा के कई इलाके पहले से ही पेयजल संकट झेल रहे हैं और पंजाब से भी हरियाणा को उसका पूरा पानी नहीं मिल रहा, तब राजस्थान को अतिरिक्त पानी देने का फैसला प्रदेश के हित में नहीं माना जा सकता।
हरियाणा कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया पर जारी बयान में कहा कि पूरे दक्षिण हरियाणा में पानी की किल्लत बनी हुई है, जबकि यमुना के जल स्तर में कमी आने से हरियाणा के छह जिलों पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसी परिस्थितियों में राजस्थान के साथ यह समझौता हरियाणा के लिए कैसे उचित हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस फैसले में प्रदेश के जनहित की बजाय सरकार की प्राथमिकताएं कुछ और दिखाई देती हैं।
राव नरेंद्र सिंह ने राज्य सरकार से इस समझौते पर पुनर्विचार करने की मांग करते हुए कहा कि हरियाणा के लोगों के जल अधिकारों और भविष्य की जरूरतों को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। वहीं, सरकार का कहना है कि राजस्थान को केवल मानसून के दौरान जुलाई से अक्टूबर के बीच उपलब्ध अतिरिक्त (सरप्लस) पानी ही पाइपलाइन के माध्यम से दिया जाएगा और इससे हरियाणा के हिस्से के पानी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

