अभय मिश्रा, मऊगंज। जब किसी अस्पताल का मुखिया ही लापरवाह हो जाए, तो वहां का सिस्टम कैसे दम तोड़ता है, इसकी जीती-जागती और खौफनाक मिसाल मध्य प्रदेश के मऊगंज जिला अस्पताल में देखने को मिल रही है। जब से ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (BMO) डॉ. प्रद्युमन शुक्ला ने अस्पताल की कमान अपने हाथ में ली है, तब से पूरा अस्पताल बदइंतजामी के ऐसे दलदल में धंस चुका है जहां मरीजों की जान की कोई कीमत नहीं बची। हालत यह है कि डॉक्टर ड्यूटी से नदारद हैं, मरीजों को स्ट्रेचर नसीब नहीं है और अस्पताल में साफ-सफाई करने वाले आउटसोर्स कर्मचारी मरीजों के शरीर में सुईयां चुभो रहे हैं। एक-एक बेड पर दो-दो मरीजों को जानवरों की तरह ठूंसा गया है।  

भीषण गर्मी में दर्द से कराहते मरीज 

ये शर्मनाक तस्वीरें किसी सुदूर गांव के उप-स्वास्थ्य केंद्र की नहीं हैं। ये मऊगंज जिला मुख्यालय के उस सिविल अस्पताल की हकीकत हैं, जिसकी कमान बीएमओ डॉ. प्रद्युमन शुक्ला के हाथों में है। आरोप है कि जब से बीएमओ शुक्ला ने चार्ज संभाला है, अस्पताल की व्यवस्था पूरी तरह से दम तोड़ चुकी है। भीषण गर्मी में दर्द से कराहते मरीज, एक ही बेड पर दो-दो मरीजों का इलाज, स्ट्रेचर के अभाव में अपनों को कंधों पर लादकर ले जाते परिजन और ओपीडी में धूल खाती डॉक्टरों की खाली कुर्सियां… यह सब साबित करता है कि अस्पताल प्रबंधन पूरी तरह से वेंटिलेटर पर है।

जिला अस्पताल में एक ‘टिटेनस’ का इंजेक्शन तक मयस्सर नहीं 

इस बदइंतजामी का गुबार तब फूट पड़ा, जब भोपाल से डिप्टी डायरेक्टर लालप्रणय सिंह निरीक्षण करने पहुंचे। साहब के सामने ही मरीजों और उनके परिजनों ने सिस्टम की बखिया उधेड़ दी। मरीजों ने चीख-चीख कर बताया कि इस जिला अस्पताल में एक ‘टिटेनस’ का इंजेक्शन तक मयस्सर नहीं है। डॉक्टर समय पर नहीं मिलते। इसी दौरान जब कुछ परिजनों को अपना मरीज कंधे पर ढोते देखा गया, तो अधिकारियों ने ‘स्ट्रेचर उपलब्ध होने’ का रटा-रटाया बहाना बनाया। लेकिन सच ये था कि स्ट्रेचर चलाने वाला कोई अटेंडर ही मौजूद नहीं था, जिसके चलते बेबस परिजनों को मरीज कंधे पर उठाना पड़ा।

आउटसोर्स कर्मचारी बने ‘डॉक्टर’

बदहाली की सबसे चौंकाने और डराने वाली तस्वीर कैमरे में तब कैद हुई, जब आउटसोर्स मल्टी-स्किल्ड ग्रुप-D कर्मचारियों को मरीजों का ‘इलाज’ करते देखा गया। जी हां, जिन हाथों में झाड़ू-पोछा और बेडशीट होनी चाहिए थी, उन हाथों में मरीजों की जान से खेलने के लिए सीरिंज थमा दी गई है। वीडियो में साफ दिख रहा है कि एक बुजुर्ग मरीज को आउटसोर्स कर्मचारी बार-बार सुई चुभो रहा है। दर्द से कराहते बुजुर्ग की पीड़ा देखकर किसी की भी रूह कांप जाए, लेकिन इंजेक्शन लगाने वाले इन अनाड़ी कर्मचारियों के चेहरे पर कोई शिकन नहीं है।

लापरवाही की हद तो देखिए, स्थानीय लोगों का आरोप है कि जो इंजेक्शन चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत कमर में लगाया जाना चाहिए था, उसे एक बुजुर्ग मरीज को टेबल पर बैठाकर लगाया जा रहा था। कई बार सुई चुभाने के बावजूद दवा अंदर नहीं गई और मरीज दर्द से तड़पता रहा। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक बिना मेडिकल डिग्री के ऐसा करना जानलेवा हो सकता है। अब सवाल यह है कि यदि किसी मरीज की जान चली जाती है, तो क्या बीएमओ या यह मुर्दा सिस्टम इसकी जिम्मेदारी लेगा?

अधिकांश डॉक्टर अपनी ड्यूटी से गायब 

बीएमओ के ‘सुशासन’ का एक और रियलिटी चेक मंगलवार शाम ठीक 5 बजकर 25 मिनट पर हुआ। जब हमारी टीम अस्पताल की ओपीडी और वार्डों में पहुंची, तो वहां सन्नाटा पसरा था। अधिकांश डॉक्टर अपनी ड्यूटी से गायब थे। एक बेबस पिता अपनी बीमार बच्ची को सीने से लगाए घंटों बाल रोग विशेषज्ञ का इंतजार करता रहा, लेकिन डॉक्टर साहब का अता-पता नहीं था। आरोप खुले हैं कि सरकारी खजाने से मोटी तनख्वाह लेने वाले ये डॉक्टर ड्यूटी के वक्त अपने निजी क्लीनिकों में मरीजों को देखकर चांदी काट रहे थे।

बीएमओ ने खुद स्वीकारी यह बात 

जब इस ‘मौत के खेल’ और बदइंतजामी पर ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ. प्रद्युमन शुक्ला से सवाल दागा गया, तो उन्होंने बड़ी ही आसानी से स्वीकार कर लिया कि वे कर्मचारी आउटसोर्स हैं और उनका काम इलाज करना नहीं है। बीएमओ के इस बयान ने मामले को और भी संगीन बना दिया है। जब प्रशासन और खुद बीएमओ को पता है कि ये कर्मचारी इलाज के लिए अधिकृत नहीं हैं, तो फिर इन्हें इंजेक्शन लगाने की छूट किसने दी? क्या यह सब खुद बीएमओ की शह पर हो रहा है या किसी बड़े रसूखदार के संरक्षण में मरीजों को मरने के लिए छोड़ दिया गया है?


मरीजों की जान से खिलवाड़ का यह कोई पहला मामला नहीं है। कुछ समय पहले भी इसी अस्पताल में एक डॉक्टर के सहयोगी द्वारा मरीजों का उपचार किए जाने का मामला सामने आया था। लेकिन तब भी कार्रवाई के नाम पर केवल कागजी औपचारिकता निभाई गई। यही वजह है कि आज भी मऊगंज अस्पताल में मौत का खुला खेल बेखौफ जारी है।

क्या जिम्मेदारों पर होगी कार्रवाई ?

जब अस्पताल की बदहाली को लेकर कमिश्नर साहब से सवाल किया गया तो उन्होंने कह दिया कि जांच कर कार्रवाई होगी।लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह कार्रवाई आखिर होगी कब? बीएमओ डॉ. प्रद्युमन शुक्ला के राज में जब अस्पताल बदहाली की आखिरी सांसें गिन रहा हो… पूरी ओ पी डी खाली पड़ी हो और सभी डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस में मस्त हों, सफाईकर्मी इंजेक्शन ठोक रहे हों और मरीज कंधों पर ढोए जा रहे हों, तो जवाबदेही किसकी तय होगी? क्या प्रशासन किसी बेगुनाह मरीज की मौत का इंतजार कर रहा है, या फिर इस बार जिम्मेदारों की कुर्सी पर वास्तव में कोई गाज गिरेगी?

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