पुरी: श्री जगन्नाथ संस्कृति में ‘हेरा पंचमी’ नीति का एक बेहद अनूठा और विशेष महत्व है। विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के पांचवें दिन माता महालक्ष्मी, बिमला मंदिर से पालकी में सवार होकर श्री गुंडिचा मंदिर पहुंचीं। वहां भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने के बाद, अपने स्वामी द्वारा अकेले गुंडिचा मंदिर चले आने से उपजे स्वाभिमान और मधुर रोष (अभिमान) के प्रतीक स्वरूप, उन्होंने महाप्रभु के ‘नंदिघोष’ रथ के एक हिस्से (काठपटा) को प्रतीकात्मक रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके बाद माता लक्ष्मी ‘हेरा गोहिरी साही’ मार्ग से वापस श्रीमंदिर लौट गईं। इस पारंपरिक और भावपूर्ण लीला को प्रत्यक्ष देखने के लिए गुंडिचा मंदिर परिसर और शरदधाबाली में हजारों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा।

बाहुड़ा यात्रा की तैयारी: आज होगा तीन रथों का ‘दक्षिण मोड़’
पावन हेरा पंचमी नीति के सफलतापूर्वक संपन्न होने के बाद, अब श्रीक्षेत्र पुरी में आज का मुख्य आकर्षण तीनों रथों का ‘दक्षिण मोड़’ (Dakhina Moda) अनुष्ठान है।
वर्तमान में महाप्रभु श्री जगन्नाथ का नंदिघोष, भगवान बलभद्र का तालध्वज और देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ गुंडिचा मंदिर के मुख्य द्वार (उत्तर दिशा) की ओर मुंह करके खड़े हैं। बाहुड़ा यात्रा (भगवान की वापसी यात्रा) की आधिकारिक तैयारियों के तहत, इन तीनों विशाल रथों को घुमाकर दक्षिण दिशा (श्रीमंदिर की ओर) अभिमुख करके खड़ा किया जाएगा।
रत्नवेदी की ओर वापसी का क्रम:
पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार, गुंडिचा मंदिर से पवित्र ‘आज्ञामाल’ (भगवान की सहमति का पुष्पहार) प्राप्त होने के बाद रथों को मोड़ने की प्रक्रिया शुरू होगी। सबसे पहले देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ, उसके बाद प्रभु बलभद्र का तालध्वज रथ और अंत में भगवान जगन्नाथ का नंदिघोष रथ मोड़ा जाएगा।
प्रशासन की व्यापक व्यवस्था और भक्तों का उत्साह
दक्षिण मोड़ नीति पूर्ण होने के साथ ही बाहुड़ा यात्रा की अंतिम तैयारियों को और तेज कर दिया जाएगा। श्रीमंदिर प्रशासन और ओडिशा पुलिस की ओर से सुरक्षा व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण और श्रद्धालुओं के सुगम दर्शन के लिए कड़े प्रबंध किए गए हैं।
आड़प मंडप में प्रभु के दर्शन के लिए भक्तों का उत्साह चरम पर है। संपूर्ण श्रीक्षेत्र पुरी इस समय भक्ति, परंपरा और आध्यात्मिकता के अनूठे वातावरण में डूबा हुआ है, और सभी श्रद्धालु अब महाप्रभु की पावन बाहुड़ा यात्रा की प्रतीक्षा कर रहे हैं।


