दुनिया के हर घर की एक आम कहानी है, पति दोस्तों या भाई-बहनों के साथ बाहर घूमने जाए और घर लौटने में देर कर दे, तो पत्नी का नाराज होना बिल्कुल लाजिमी है. यह एक ऐसा खूबसूरत मान-अभिमान है जो रिश्तों को जिंदा रखता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि पुरी की रथ यात्रा के दौरान साक्षात भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी के बीच भी ठीक ऐसा ही एक घरेलू और बेहद प्यारा झगड़ा देखने को मिलता है?

रहस्य और भक्ति से भरी जगन्नाथ संस्कृति में इस दिव्य नोकझोंक को हम ‘हेरा पंचमी’ (Hera Panchami) के रूप में मनाते हैं. यह त्योहार बताता है कि भगवान केवल गर्भगृह में पूजे जाने वाले देव नहीं, बल्कि हमारी और आपकी तरह सुख-दुख और भावनाओं को महसूस करने वाले एक आत्मीय साथी भी हैं.
जब अकेली रह गईं माता लक्ष्मी…
कहानी शुरू होती है रथ यात्रा से कुछ दिन पहले. ज्येष्ठ पूर्णिमा के शाही स्नान के बाद महाप्रभुओं की तबीयत खराब होती है और वे 15 दिनों के लिए एकांतवास (अणसर) में चले जाते हैं. माता लक्ष्मी दिन-रात उनकी सेवा करती हैं. लेकिन जैसे ही भगवान ठीक होते हैं, वे माता लक्ष्मी को बिना बताए अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ नौ दिनों के लिए मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) घूमने निकल जाते हैं.
पीछे भव्य श्रीमंदिर में माता लक्ष्मी अकेली रह जाती हैं. चार दिन बीत जाते हैं, पर भगवान नहीं लौटते. एक आम पत्नी की तरह उनका इंतजार, अब गुस्से और विरह में बदलने लगता है. तब श्रीमंदिर की रक्षक माता विमला उन्हें समझाती हैं और भगवान को वापस आकर्षित करने के लिए एक जादुई ‘मोहन चूर्ण’ देती हैं.
गुंडिचा मंदिर में हंगामा और रथ का टूटना
पति की याद में व्याकुल माता लक्ष्मी पालकी में बैठकर, पूरे दलबल के साथ बड़दांड (मुख्य सड़क) होते हुए गुंडिचा मंदिर पहुँचती हैं. वहां वे भगवान पर ‘मोहन चूर्ण’ फेंकती हैं, जिसके बाद भगवान उन्हें मनाने के लिए अपनी सहमति की माला (आज्ञामाला) भिजवाते हैं.
पर बात इतने से कहाँ बनने वाली थी! इतने दिनों की बेरुखी से नाराज माता लक्ष्मी अपने सेवकों को आदेश देती हैं कि भगवान के भव्य रथ ‘नंदीघोष’ का एक हिस्सा तोड़ दिया जाए, ताकि पतिदेव को समझ आए कि पत्नी को छोड़कर आने का नतीजा क्या होता है. हालांकि, रथ को नुकसान पहुँचाने के बाद उन्हें अपनी गलती का अहसास भी होता है और वे किसी तामझाम के बिना, एक गुप्त रास्ते (हेरा गोहिरी साही) से चुपचाप रोती-रूठती वापस लौट आती हैं.
इतिहास और परंपरा के पन्नों में हेरा पंचमी
राजा कपिलेंद्र देव की पहल: ‘रथ चकड़ा’ ग्रंथ के अनुसार, राजा कपिलेंद्र देव ने ही इस साधारण सी पूजा को एक भव्य, नाटकीय और राजसी उत्सव का रूप दिया था.
लौटने की तैयारी: हेरा पंचमी के दिन ही भगवान के रथों को वापस मंदिर की ओर घुमाया जाता है, जिसे ‘दक्षिण मोड़’ कहते हैं. यहीं से बहुड़ा यात्रा (वापसी) की शुरुआत होती है.
अखबारों में जगह: 28 जुलाई 1888 को ओडिशा के पहले स्थानीय अखबार ‘उत्कल दीपिका’ ने इस परंपरा पर पहला लेख छापा था, जिसने संस्कृति को लोगों के घरों तक पहुँचाया.
यह त्योहार हमें सिखाता है कि गुस्सा चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसके पीछे छिपा हुआ प्रेम और अधिकार ही किसी रिश्ते की असली खूबसूरती है.


