वीरेन्द्र गहवई, बिलासपुर। नशीली दवाओं की अवैध तस्करी और उसे वित्तीय सहायता देने के मामले में हाईकोर्ट ने आरोपी की दूसरी जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि प्रतिबंधित दवाओं के अवैध कारोबार से जुड़े मामलों में सह-आरोपी के खाते में यूपीआई के जरिए किया गया संदिग्ध वित्तीय लेनदेन अपराध में संलिप्तता को दर्शाता है। इसलिए एनडीपीएस एक्ट के तहत राहत नहीं दी जा सकती।

कोर्ट ने कहा कि पूर्व में पहली जमानत याचिका खारिज होने और एनडीपीएस एक्ट की विधिक कठोरता को देखते हुए, यह कोर्ट दूसरी जमानत अर्जी स्वीकार करने का कोई आधार नहीं है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को यह छूट दी है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए इस मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाए और जल्द अंतिम फैसला सुनाए।
क्या है मामला
दरअसल, अंबिकापुर में पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से कोडीन फॉस्फेट युक्त कफ सिरप की 100-100 एमएल की 108 बोतलें और बुप्रेनॉर्फिन के 2-2 एमएल के 100 नग इंजेक्शन जब्त किए थे। जांच के दौरान खुलासा हुआ कि आरोपी आवेदक जगदीश उर्फ विराट ने अपने मोबाइल से यूपीआई के जरिए 25 हजार रुपए की राशि एक सह-आरोपी के बैंक खाते में ट्रांसफर की थी। पुलिस ने इस वित्तीय लेनदेन को नशीली दवाओं के अवैध कारोबार की फंडिंग और आपराधिक साजिश का हिस्सा मानते हुए जगदीश को 21 मई 2025 को गिरफ्तार कर लिया था। हाईकोर्ट ने 1 सितंबर 2025 को पहली जमानत याचिका खारिज कर दी थी।
इसके बाद दूसरी जमानत याचिका दायर कर कहा गया कि सीधे तौर पर किसी भी प्रकार का नशीला पदार्थ या प्रतिबंधित सामग्री बरामद नहीं हुई है। सह-आरोपी अनिल गुप्ता उर्फ बाबू गुप्ता की चिकन की दुकान, याचिकाकर्ता की दुकान के बगल में ही है। 17 फरवरी 2025 को अनिल ने यूपीआई काम न करने की बात कहकर मदद मांगी थी, जिस पर आवेदक ने मानवता के नाते 25 हजार रुपये ट्रांसफर किया था।
शासन ने इसका विरोध किया और कहा कि यूपीआई लेन-देन यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि याचिकाकर्ता इस नेटवर्क को वित्तीय ऑक्सीजन दे रहा था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, यह मामला नशीली दवाओं के अवैध व्यापार के एक संगठित नेटवर्क और उसकी वित्तीय सहायता से संबंधित है इसलिए याचिका खारिज की जाती है।
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